मार्च 2020 में जब चीन से कोरोना फटकर सारी दुनिया में फैला तो कहा गया कि यह आपदा भारत के लिए शानदार अवसर है। दुनिया ‘चाइना प्लस वन’ नीति अपनाएगी और इसका भरपूर फायदा भारत को मिलेगा। लेकिन पांच साल बाद पता चला कि सारा फायदा बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया व मलयेशिया जैसे देश ले गए। ऊपर से चीन भारत में घुसता चला गया और हमारी सारी मैन्यूफैक्चरिंग चीन पर निर्भर हो गई। आज उस प्रसंग को भुलाकर ट्रम्प के 50% टैरिफ लगाने पर फिर कहा जा रहा है कि यह भारत के लिए उठ खड़े होने का साल 1991 जैसा पल है। सवाल उठता है कि जिस सरकार ने 11 साल में मैन्यूफैक्चरिंग को खोखला कर देश को इस हाल में पहुंचा दिया कि वो अमेरिका का माकूल जवाब नहीं दे सकता, उससे ‘1991 जैसे पल’ का लाभ उठाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मेक-इन इंडिया जैसी औद्योगिक नीति फेल, निजी क्षेत्र रिस्क लेने को तैयार नहीं, आर एंड डी पर खर्च बढ़ा नहीं, सरकार जो कहती है, करती नहीं। किसी उद्योगपति या संस्था में सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं। ऐसे में आत्मनिर्भरता का नारा कोरा पाखंड हैं। हां, मोदी सरकार ने जनता से टैक्स वसूलने में ज़रूर पूरी कामयाबी हासिल की है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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