तथ्य सत्य भी हो, कतई जरूरी नहीं
हम जितना देख पाते हैं, उतना मानकर चलते हैं। धरती वही। पहले सपाट मानते थे, अब गोल है। मानने को बदल दें तो देखने का फ्रेम/संदर्भ बदल जाता है, तथ्य बदल जाते हैं। मानिए तो शंकर है, कंकर है अन्यथा। यह आस्था की बात है। लेकिन ट्रेडिंग करते वक्त आस्था नहीं, सत्य की दृष्टि काम आती है। जो अपनी धारणाओं से निकलकर जितना सत्य देख पाता है, उतना कामयाब होता है। धारणाओं से ऊपर उठकर देखें बाज़ार…औरऔर भी
एक्सपर्टों की बात शोर है, सच नहीं
अर्थशास्त्र और फाइनेंस ही नहीं, किसी भी क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ बुनियादी समस्या यह है कि वे नहीं जानते कि वे क्या नहीं जानते। आत्ममोह और विभ्रम में वे देख नहीं पाते कि उनकी सोच के दायरे के बाहर बहुत कुछ छूटा हुआ है। मानव ज्ञान के विकास में, दूसरे विषय तो छोड़िए, साइंस तक के बारे में पिछली दो सदियों में बार-बार कहा गया कि अब तक जो जानना था, जाना जा चुका है। आगेऔरऔर भी








