अल्पकालिक ट्रेडिंग से कमाई और दीर्घकालिक निवेश से दौलत। यही सूत्र लेकर करीब सवा साल पहले हमने यह पेड-सेवा शुरू की थी। दीर्घकालिक निवेश की सेवा, तथास्तु को लेकर हम डंके की चोट पर कह सकते हैं कि हमसे बेहतर कोई नहीं। सूझबूझ की कृपा से इसमें सुझाए कई शेयर साल भर में चार गुना तक बढ़ चुके हैं। ट्रेडिंग में भी हम रिसर्च से आपकी रणनीति विकसित करने में लगे हैं। करें अब शुक्रवार का प्रस्थान…औरऔर भी

बाज़ार में मूलतः दो तरह की गतियां होती हैं। पहली, जिनके पीछे कोई न कोई घटनाक्रम, कोई खबर होती है। इनको पकड़ना आसान लगता है। लेकिन है बहुत कठिन। फिर खबर हमारे पास पहुंचे, इससे पहले ऊंची पहुंच वाले उसे पकड़कर बाज़ार में खेल कर चुके होते हैं। दूसरी गति अनायास होती है। उसके पीछे कोई प्रत्यक्ष वजह नहीं होती। कमाल की बात है कि अनायास होनेवाली इस गति को पकड़ना आसान है। अब आज का व्यवहार…औरऔर भी

सिद्धांततः बाज़ार शक्तियां निष्पक्ष होती हैं। पर व्यवहार में भारत जैसे विकासशील देश ही नहीं, अमेरिका व यूरोप जैसे विकसित देशों तक में निहित स्वार्थ बाज़ार को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। दो साल पहले उजागर हुआ कि डीबीएस, डॉयचे बैंक, जेपी मॉर्गन व सिटी बैंक जैसे तमाम बैंक दशकों से लिबोर के साथ छेड़छाड़ करते आ रहे हैं। भारतीय शेयर बाज़ार में ऐसा खेल धड़ल्ले से चलता है। कल भी ढाई बजे कुछ ऐसा ही हुआ…औरऔर भी

जूडो-कराटे ही नहीं, गीता तक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ होने की सलाह दी है। ट्रेडिंग में भी कहते हैं कि अपनी भावनाओं को वश में रखो, उन्हें ट्रेडिंग पर कतई हावी मत होने दो। ऐसा करना ज़रूरी है। लेकिन क्या कामयाबी के लिए इतना पर्याप्त है? आप ही नहीं, दुनिया भर के ट्रेडरों का अनुभव इसका जवाब नहीं में देगा। दरअसल, बाज़ार शक्तियों की पूरी मैपिंग आपके दिमाग में होनी चाहिए। पकड़ते हैं मंगलवार का ट्रेड…औरऔर भी

इंसानी दिमाग बना ही ऐसा है कि वो सीधी-साफ चीजें चाहता है। भले ही ऐसी बातों में दम हो या न हो। इसी कमज़ोरी को पकड़ने के लिए टेलिविज़न न्यूज़ के एंकर इस तरह बात करते हैं जैसे उनको सर्वज्ञ हों। लेकिन इतना सरलीकरण आम जीवन में नहीं चलता तो फाइनेंस व शेयर बाज़ार की बात ही क्या। इसीलिए प्रोफेशनल ट्रेडर के लिए बिजनेस चैनलों को देखना तत्काल बंद करना ज़रूरी है। चलिए देखें सोमवार की संभावनाएं…औरऔर भी

दीर्घकालिक निवेश की सलाहों में अगर आपको घाटा लगता है तो इसका आम दोष शेयर बाज़ार में निवेश के अपरिहार्य रिस्क के साथ खास दोष सिर्फ और सिर्फ मेरा है। सारे पक्षों के आकलन में कहीं चूक रह गई होगी। लेकिन अल्पकालिक ट्रेडिंग में अगर फायदा हुआ तो इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ आपका है। यहां मेरी सलाह महज एक इनपुट है। असली फैसला तो आपका होता है जो फायदा कराता है। अब हफ्ते का आखिरी ट्रेड…औरऔर भी

शेयरों की चाल को पकड़ने का अचूक उपाय है कि उनके भाव को प्रभावित करनेवाली खबरें आपको सबसे पहले पता चल जाएं। लेकिन ऐसा होने लगे तो बाज़ार का वजूद ही मिट जाएगा। बाज़ार की मूल शर्त है कि यहां मूल्य-संवेदी खबरें हर किसी को समान अवसर और प्लेटफॉर्म पर मिलनी चाहिए। इसकी गारंटी करने के लिए दुनिया भर में इनसाइडर ट्रेडिंग को अपराध माना गया है। ऐसे में चार्ट ही सहारा हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आठ मई से नौ जून तक एक महीने के भीतर भेल, बेल, सेल व गेल जैसी तमाम सरकारी कंपनियों के शेयर 20% से लेकर 70% तक बढ़ चुके हैं। स्वाभाविक है कि जिन्होंने इन्हें फूंक मारकर फुलाया, वे मुनाफावसूली तो इनमें करेंगे ही। आम निवेशकों को भी इन्हें बेचकर निकल लेना चाहिए। साथ ही ट्रेडरों को इनमें लॉन्ग नहीं, शॉर्ट करने के मौके ढूंढने चाहिए। गुबार पूरा उतर जाएगा तो मजबूत कंपनियां खिलेंगी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हल्ला है कि मोदी के राज में सरकारी कंपनियां बेहतर काम करेंगी। यही वजह है कि पिछले तीन महीनों में बीएसई सेंसेक्स जहां 12.7% बढ़ा है, वहीं बीएसई पीएसयू सूचकांक 39.7% बढ़ गया। पर क्या सरकारी दखल के हट जाने में वाकई वो चमत्कार है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां चमकने लगेंगी? सोचिए, क्या सरकारी बैंकों के गले में फंसे 1.64 लाख करोड़ रुपए के डूबत ऋण की समस्या यूं ही सुलझ जाएगी? अब वार मंगल का…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार हमेशा ही बड़ी पूंजी के इशारों पर नाचता है। लेकिन इधर उसके खेल ज्यादा ही निराले हो गए हैं। वे एमएफसीजी या फार्मा जैसे सदाबहार स्टॉक्स को दबाकर औने-पौने शेयरों को उछाल रहे हैं। मजबूत शेयर गिर रहे हैं, कमज़ोर शेयर कुलांचे मार रहे हैं। मिडकैप व स्मॉलकैप सूचकांक मुख्य सूचकाकों से दोगुना बढ़ रहे हैं। उस्ताद लोग बाद में कमज़ोर शेयरों को बेचकर फिर से खरीदेंगे मजबूत स्टॉक। अब हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी