अक्टूबर में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 0.25% और नवंबर में बढ़कर 0.71% हो गई है। यह भी नहीं हुआ होता, अगर नवंबर में साल भर पहले से सोने के दाम 58.32% और चांदी के दाम 65.52% नहीं बढ़ गए होते। आप रोते रहिए कि दो महीने में एक दर्जन अंडे का भाव 66 रुपए से 39.39% बढ़कर 92 रुपए हो गया। लेकिन सरकार कहेगी कि अंडा साल भर पहले से 5.2% ही महंगा हुआ है। आईएमएम जैसाऔरऔर भी

अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर इस साल अगस्त में 2.9% और सितंबर में 3% रही है। अक्टूबर में सरकार के शटडाउन के चलते डेटा नहीं जारी हुआ, जबकि नवंबर का डेटा 18 दिसंबर को आएगा। चीन में मुद्रास्फीति की दर अक्टूबर में 0.2% और नवंबर में 0.7 रही है। जापान में मुद्रास्फीति सितंबर में 2.9% और अक्टूबर में 3% रही है। जर्मनी में मुद्रास्फीति की दर सितंबर में 2.4%, अक्टूबर में 2.3% और नवंबर में भी 2.3%औरऔर भी

जीडीपी का डेटा ऊपर-ऊपर जैसा दिखाता है, अंदर घुसने पर पता चलता है कि वैसा कतई नहीं है और हकीकत बड़ी दारुण है। आखिर जीडीपी का बढ़ना और निजी क्षेत्र के घटिया प्रदर्शन एक साथ कैसे? जीडीपी में निजी क्षेत्र से जुड़े दो सबसे बड़े हिस्से हैं पीएफसीई (प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर) या निजी खपत पर होनेवाला खर्च और निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश। निजी खपत बढ़ती है तो निजी पूंजी निवेश भी बम-बम करता है। लेकिनऔरऔर भी

संयोग या प्रयोग से सत्ता में हाथ में आ जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बनाकर येनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की सिद्धि हासिल कर ले तो किसी भी सत्ताधारी दल को गुमान हो जाता है कि वो भोलेभाले आम लोगों को ही नहीं, मीडिया से लेकर बुद्धिजीवियों व अर्थशास्त्रियों तक को चरका पढ़ा सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा कभी लम्बे समय तक नहीं चलता। शासन की नंगई एक न एक दिन सबसेऔरऔर भी

जब विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.5% से 2.6% पर अटकी पड़ी हो, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के इस साल 2025 में बहुत हुआ तौ 1.6% बढ़ने का अनुमान वहां का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व जता रहा हो, दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की विकास दर घटकर 4.5% पर आ गई हो, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस साल जून तिमाही में 7.8% और सितंबर तिमाही में 8.2% बढ़ जाना किसी को भी हतप्रभ कर सकता है।औरऔर भी

देश के राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों पर आईएमएफ के एतराज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की प्रतिक्रिया को बेहयाई नहीं, केवल थेथरई कहा जा सकता है। मोदी तो अभी भी देश को राष्ट्रगीत वंदे मातरम तक के नामं पर 2047 विकसित बनाने का झांसा दिए जा रहे हैं। वहीं, निर्मला सीतारमण राष्ट्रीय खातों की विसंगतियों को महज आधार वर्ष को बदलने के तकनीकी पेंच में उलझा देना चाहती हैं। महोदया, असल सवाल यह हैऔरऔर भी

जो बात दबी जुबान से कई सालों से कही जा रही थी, ‘अर्थकाम’ जिसको लेकर हल्ला मचाता रहा है, जिसे वो अर्थव्यवस्था के साथ वोट-चोरी जैसा अपराध बताता रहा है, जिसे देशभक्त व जागरूक अर्थशास्त्री बराबर उठाते रहे हैं और जिसे हाल में बिजनेस चैनल व पोर्टल भी उठाने लगे थे, वो अब जगजाहिर हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा सालाना समीक्षा में कहा है कि भारत के जीडीपी, जीवीए और मुद्रास्फीति जैसे राष्ट्रीयऔरऔर भी

शेयर बाजार की ट्रेडिंग तात्कालिकता का खेल है, लम्बे समय के निवेश का नहीं। अगर किसी को भ्रम है कि वो कंपनी के फंडामेंटल जानकर उसके शेयरों में ट्रेडिंग कर सकता है तो उसे डूबने से कोई नहीं बचा सकता। बाज़ार में उतरनेवाले हर ट्रेडर को मन में कहीं गहरे बैठा लेना होगा कि ट्रेडिंग दांव लगाने या सट्टेबाज़ी का ही खेल है। यह भी कि अगर हम अपने रिस्क को संभालकर चलें तो सट्टेबाज़ी अपने-आप मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग विशुद्ध रूप से कयासबाज़ी या सट्टेबाज़ी का खेल है। इसका कोई वास्ता कंपनियों के फंडामेंटल्स या बिजनेस के हाल-चाल से नहीं होता। अर्थव्यवस्था और आर्थिक नीतियों से भी इसका कोई सीधा रिश्ता नहीं। ट्रेडिंग में सबसे अहम है कि शेयर के भाव अभी क्या हैं और आगे कहां तक जा सकते हैं। फर्क समझें कि शेयरों में दीर्घकालिक निवेश बैक एफडी या प्रॉपर्टी में धन लगाने जैसा काम है, जबकि ट्रेडिंग विशुद्ध बिजनेसऔरऔर भी

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अपने शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते है। सालों-साल से इस सच पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। खुद पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने ब्रोकरों से डेटा लेकर इस हकीकत की पुष्टि अपनी कई अध्ययन रिपोर्टों में की है। लेकिन हम ब्रोकरों से लेकर एनालिस्टों, स्टॉक एक्सचेंजों और सेबी व सरकार तक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वे बाज़ार मेंऔरऔर भी