डॉलर की फांस फिर चुभने लगी है। रुपया गिरने लगा है। लेकिन ज्यादा गिरने की उम्मीद नहीं है क्योंकि इस बार रिजर्व बैंक के पास सिस्टम में डालने के लिए पर्याप्त डॉलर हैं। इस बीच सितंबर में हमारा औद्योगिक उत्पादन 2% बढ़ा है, जबकि अगस्त में यह 0.4% ही बढ़ा था। यह ठीकठाक खबर है। पर अक्टूबर में उपभोक्ता मुद्रास्फीति का उम्मीद से ज्यादा 10.09% बढ़ना बुरी खबर है। क्या होगा इस खबरों का असर, बताएगा बाज़ार…औरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया ज्यादा अस्थिर, ज्यादा रिस्की हो चली है। ग्लोबल हरकतें लोकल खबरें बन गई हैं। नेट व चौबीसों घंटे चलते न्यूज़ चैनलों ने सूचनाओं को सर्वसुलभ करा दिया। पर प्रोफेशनल फंड मैनेजर सूचनाओं के आम होने से पहले ही उनका खास इस्तेमाल कर लेते हैं। खबर हम तक पहुंचे, इससे पहले वे उसका रस निकाल लेते है। लेकिन सारी हरकतें जाती हैं भाव में। इसलिए भाव को पकड़ो, भाव पर खेलो। अब देखें बाज़ार मंगल का…औरऔर भी

पहले नौकरी। फिर जूस की दुकान। अब ट्रेडिंग का जुनून सवार है। सारी पोथियां बांच डालीं। चार्ट पर इतने सारे इंडीकेटर चिपकाए कि माथा झन्ना गया। अरे भाई! इतना उलझाव क्यों? जीवन में कठिनतम सवालों के जवाब बड़े आसान हुआ करते हैं। बाज़ार कैसे काम करता है, आगे क्या होनेवाला है, आप सही-सही कभी नहीं जान पाएंगे। ट्रेडिंग में कूदने से पहले इसे गांठ बांध लें। यह गारंटी नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब रुख सोमवार का…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार के रोज़ के औसत टर्नओवर में 2001 से 2013 तक के 12 सालों में आम भारतीय निवेशकों की भागीदारी 89.46% से घटकर 34.31% पर आ चुकी है, जबकि विदेशी निवेशकों का हिस्सा 7.95% से 47.25% पर पहुंच गया। इसी दौरान घरेलू संस्थाओं की भागीदारी 2.59% से 18.44% हो गई। विदेशियों के धन पर यूं बढ़ती निर्भरता देश की सेहत के लिए कतई अच्छी नहीं। आप सोचें इस मुद्दे पर। चलें अब शुक्र की ओर…औरऔर भी

जब लार्जकैप या बड़ी कंपनियों में जमकर खरीद हो चुकी होती है तो उनमें कुछ दिनों के लिए मुनाफावसूली चल निकलती है। ठीक इसी वक्त मिडकैप स्टॉक्स में खरीद बढ़ने लगती है और वे फटाफट उढ़ने लगते हैं। फिलहाल बाज़ार का यही हाल है। लेकिन जैसे ही कोई बुरी खबर आएगी, यही मिडकैप स्टॉक्स बड़ी तेज़ी से गिरेंगे, जबकि लॉर्जकैप या तो संभले रहेंगे या गिरेंगे तो बहुत थोड़ा। इस सावधानी के साथ अब नज़र आज पर…औरऔर भी

दीर्घकालिक निवेश और अल्पकालिक ट्रेडिंग के नीति-नियम अलग-अलग हैं। निवेश को लेकर वॉरेन बफेट का कहना है कि जब बाज़ार में औरों पर लालच हावी हो तो आप डर-डरकर कदम उठाएं और जब औरों पर डर छाया हो तो आप लालची हो जाएं। लेकिन ट्रेडिंग में न्यूनतम रिस्क की नीति कहती है कि जब बाज़ार लालच से पागल हो उठा हो तब आप कभी भी बेचकर या शॉर्ट से कमाने की न सोचें। अब बुधवार का बाज़ार…औरऔर भी

सरकार और ज्यादातर कंपनियों का वित्त वर्ष अप्रैल से। किसानों का नया साल मार्च-अप्रैल के बीच चैत्र से। लेकिन व्यापारियों का नव वर्ष दीवाली के बाद से शुरू होता है। सभी का अपना-अपना जीवन-चक्र। शेयर बाज़ार के ट्रेडर भी एक तरह के व्यापारी हैं। रणनीति होनी चाहिए कि थोक में खरीदो, रिटेल में बेचो। पर ज्यादातर ट्रेडर रिटेल के भाव खरीदते हैं और घबराकर थोक के भाव पर निकल जाते हैं। करते हैं संवत 2070 की शुरुआत…औरऔर भी

हम न तेजड़िये हैं, न मंदड़िए। हम हैं विशुद्ध ट्रेडर। ज़रा-सा मौका देखकर चोला बदल लेते हैं। वैसे भी शाश्वत तेजड़िया या शाश्वत मंदड़िया जैसी कोई शख्सियत नहीं। यह बाज़ार का गढ़ा मिथ है। जिसको जहां जैसे मौका मिलता है, वैसे कमाता है। हमारी रणनीति होनी कि जो शेयर महंगे चल रहे हैं, उन्हें नीचे आने पर थोड़ा सस्ते में खरीदो और जो शेयर सस्ते चल रहे हैं, उन्हें उठने पर शॉर्ट करो। अब हाल-ए-बाज़ार आज का…औरऔर भी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी से पुराने गठबंधन के बारे में कल एक बड़ी अच्छी बात कही। उन्होंने कहा कि हमने जुआ नहीं खेला, जोखिम लिया था। ट्रेडिंग में जुए और जोखिम का यह फर्क समझना ज़रूरी है। ज्यादातर लोग जुए की मानसिकता से ट्रेड करते हैं। यही सोच उन्हें डुबाती है। हमें पता होना चाहिए कि किस ट्रेड में कितना पाने के लिए कितना जोखिम ले रहे हैं। क्या बाज़ार आज छुएगा ऐतिहासिक शिखर…औरऔर भी

हर दिन सैकड़ों शेयर बढ़ते हैं, सैकड़ों गिरते हैं। जैसे, कल एनएसई में 677 शेयर बढ़े तो 481 गिरे। इन सभी में ट्रेडिंग के अवसर थे। लेकिन कौन बढ़ा, कौन घटा, यह हो जाने के बाद पता चलता है। हमें इन अवसरों को पहले पकड़ना होता है ताकि अपनी पूंजी बढ़ा सकें। हर ट्रेडर अपनी रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से शेयर चुनता है। लेकिन हमारा मकसद होना चाहिए न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी