हल्ला है कि मोदी के राज में सरकारी कंपनियां बेहतर काम करेंगी। यही वजह है कि पिछले तीन महीनों में बीएसई सेंसेक्स जहां 12.7% बढ़ा है, वहीं बीएसई पीएसयू सूचकांक 39.7% बढ़ गया। पर क्या सरकारी दखल के हट जाने में वाकई वो चमत्कार है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां चमकने लगेंगी? सोचिए, क्या सरकारी बैंकों के गले में फंसे 1.64 लाख करोड़ रुपए के डूबत ऋण की समस्या यूं ही सुलझ जाएगी? अब वार मंगल का…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार हमेशा ही बड़ी पूंजी के इशारों पर नाचता है। लेकिन इधर उसके खेल ज्यादा ही निराले हो गए हैं। वे एमएफसीजी या फार्मा जैसे सदाबहार स्टॉक्स को दबाकर औने-पौने शेयरों को उछाल रहे हैं। मजबूत शेयर गिर रहे हैं, कमज़ोर शेयर कुलांचे मार रहे हैं। मिडकैप व स्मॉलकैप सूचकांक मुख्य सूचकाकों से दोगुना बढ़ रहे हैं। उस्ताद लोग बाद में कमज़ोर शेयरों को बेचकर फिर से खरीदेंगे मजबूत स्टॉक। अब हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

ट्रेडिंग का वास्ता कंपनी के फंडामेंटल्स या बैलेंसशीट से ज्यादा लोगों की भावनाओं को पढ़ने से हैं। वर्तमान नहीं, भविष्य पर, यथार्थ नहीं, उम्मीद पर चलते हैं भाव। तभी तो घाटे में चल रही कंपनियों के भाव भी चढ़े रहते हैं और अच्छे नतीजों के बावजूद शेयर गिर जाते हैं। लोगों की भावना की ताकत बताती है टेक्निकल एनालिसिस। लेकिन पारंपरिक पद्धति की खामी यह है कि वह देर से देती है सिग्नल। हम चलें उससे आगे…औरऔर भी

जहां खटाखट पाने का लालच जितना बड़ा होता है, वहां उतनी ही तादाद में ठगों का जमावड़ा जुटता है। चाहे वो गया में पिंडदान करानेवाले पंडे हों या बनारस के खानदानी ठग। शेयर व कमोडिटी बाज़ार में लालच जबरदस्त है तो यहा भी ठगों की कमी नहीं। कोई लूटता टिप्स के नाम पर तो कोई सिखाने के नाम पर। बड़ी-बड़ी बातें। एक से एक गुरुघंटाल। आप करें चमत्कार को दूर से नमस्कार। हम देखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जहां दुनिया पल-पल बदलती हो, वहां बेजान किताबी ज्ञान या कोई रूढ़ि घातक साबित हो सकती है। जैसे, ट्रेडिंग की किताबें कहती हैं कि वोल्यूम का बढ़ना ट्रेंड की निरंतरता को दिखाता है। लेकिन वोल्यूम भीड़ के टूटकर आने या निकलने से भी बढ़ता है और उसके फौरन बाद सप्लाई और डिमांड का संतुलन टूटते ही बाज़ार का रुख पलट जाता है। ध्यान रखें, नियम से सच नहीं, सच से नियम निकलते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

धन का पूरा तंत्र है। कम से कम आज की ग्लोबल दुनिया में शेयर बाज़ार को मुद्रा से स्वतंत्र मानना घातक होगा। लेकिन दोनों में सीधा रिश्ता भी नहीं कि डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत तो शेयर बाज़ार बढ़ेगा, नहीं तो घटेगा। कल रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार तीसरे दिन कमज़ोर हुआ, जबकि शेयर बाज़ार तीन हफ्ते में सबसे ज्यादा बढ़ गया। तेल आयातकों की डॉलर मांग बढ़ी तो गिरा रुपया। देखते हैं कहां लगी सबकी नज़र…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश नहीं, लेकिन ट्रेडिंग ज़ीरो-सम गेम है। ठीक जब एक बढ़ने की उम्मीद में खरीदता है तो दूसरा गिरने के डर से बेचता है। तभी सौदा संपन्न होता है। एक सही होगा तो दूसरा शर्तिया गलत। बस हमें ध्यान रखना चाहिए कि सामनेवाला प्रोफेशनल ट्रेडर न हो। वरना, हमारा हारना तय है क्योंकि वो सबल है। इसलिए या तो प्रोफेशनल ट्रेडर के साथ चलें या उससे बचकर। अब हलचल भरे हफ्ते का पहला दिन…औरऔर भी

एक लाख रुपए पर हर दिन कोई तीन प्रतिशत भी कमाए तो महीने के बीस कारोबारी सत्रो में 60,000 रुपए कमा सकता है। बड़ी आसान दिखती है शेयर बाज़ार से यह कमाई क्योंकि रोज़ बीसियों शेयर तीन प्रतिशत से ज्यादा उठते-गिरते हैं। बढ़नेवाले को खरीदकर कमाओ, गिरनेवाले को शॉर्ट करके। मौजा ही मौजा! लेकिन यह सीन तब का है, जब वो घट चुका है। मान लीजिए जो सोचा, उसका उलटा हो गया तो! अब अभ्यास शुक्र का…औरऔर भी

हर दिन एनएसई में 1500 से ज्यादा कंपनियों के शेयर ट्रेड होते हैं। इनमें से हर किसी को ट्रैक या ट्रेड करना किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए हर ट्रेडर को अपने हिसाब से कंपनियां छांट लेनी चाहिए। यह काम उसे खुद अपने स्वभाव और पसंद-नापसंद के हिसाब से करना होगा। जैसे, कुछ धांधलियों के चलते मुझे जिंदल व आदित्य बिड़ला समूह की कंपनियां नहीं सुहाती तो मैं उन्हें अमूमन नहीं देखता। अब गुरुवार की दृष्टि…औरऔर भी

प्रवर्तकों से मिलकर खेल करनेवाले इनसाइडर ट्रेडरों को छोड़ दें तो शेयर बाज़ार में रिटेल और प्रोफेशनल, दो ही तरह के ट्रेडर आपस में भिड़ते हैं। प्रोफेशनल ट्रेडर ज्यादा समय व संसाधन लगाता है तो उसकी स्थिति बेहतर होती है। लेकिन वो छोटे सौदों को हाथ नहीं लगा सकता। रिटेल ट्रेडर ऐसे कई मसलों में उस पर भारी पड़ता है। रिटेल ट्रेडरों को इन खासियतों को समझकर अपनी ट्रेडिंग रणनीति बनानी चाहिए। अब देखें बुधवार की धार…औरऔर भी