वित्तीय बाज़ार में स्थितियां हर पल बदलती हैं। इसलिए हर रणनीति को इस निरंतर सक्रियता को ध्यान में रखते हुए मांजते रहना पड़ता है। मसलन, स्टॉप लॉस एक बार लगा देना बाज़ार की गति से साथ मेल नहीं खाता तो इसे सुलझाने के लिए स्टॉप लॉस को स्टॉक की गति से हिसाब से उठाया जाता है। इसे इनवर्स पिरामिडिंग कहते हैं। लेकिन ऐसा केवल लॉन्ग या खरीद के सौदे में करना उचित है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जब बाज़ार पर बाहरी ही नहीं, घरेलू चंचलता भी छाई हो, तब ट्रेडिंग में सफलता के लिए रिस्क को संभालना बेहद ज़रूरी हो जाता है। इसका एक प्रचलित व आसान तरीका है पोजिशन साइज़िंग। यह शुरुआती ट्रेडरों के लिए है। अगर 50,000 रुपए की ट्रेडिंग पूंजी है तो उसके बीस बराबर हिस्से कर किसी ट्रेड में एक हिस्सा, यानी 2500 रुपए ही लगाते हैं और हमेशा 95% पूंजी बचाकर चलते हैं। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जल्दी ही परीक्षा में किताब साथ रखने की छूट दी जा सकती है। लेकिन इसका फायदा वही छात्र उठा पाएंगे जिन्होंने किताब को अच्छी तरह समझा होगा। उसी तरह सवा नौ बजे के बाद तो बाज़ार की चाल सामने आ जाती है। हम भले ही निफ्टी की दशा-दिशा बाज़ार खुलने से एक घंटे पहले बता देते हों। लेकिन उसका तब तक कोई फायदा नहीं, जब तक आप रिस्क संभालने में पारंगत न हो। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शुरुआत चाहे चीन से हुई हो या जापान से। हकीकत यही है कि दुनिया पर आर्थिक सुस्ती मंडराने का भयंकर डर समा गया है। हल्ला उठा कि जापान की तरह अमेरिका भी ब्याज दरों को ऋणात्मक कर सकता है। यानी, बैंक में धन रखने पर ब्याज मिलेगा नहीं, देना पड़ेगा। बीते हफ्ते इन्हीं चर्चाओं के बीच आखिरी दिन बढ़ने के चलते अमेरिकी बाज़ार 2% ही गिरा। लेकिन जापान का बाज़ार 11% गिरा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

रिस्क संभालने की रणनीति का आखिरी चरण। इसमें गिनते हैं कि किसी सौदे में चुनी गई कंपनी के कितने शेयर ट्रेडिंग के लिए जाने हैं। मान लीजिए, हमने एसबीआई को 160 पर खरीदना तय किया और पक्का स्टॉप-लॉस 155 रुपए का है। इस तरह एक शेयर पर 5 रुपए गंवाने का रिस्क है। हमारा रिस्क एक सौदे में 500 रुपए डुबाने का है तो हम एसबीआई के 100 (=500/5) शेयर खरीद सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिस्क संभालने के लिए प्रत्येक ट्रेड में उसकी मात्रा निकालना आवश्यक है। जैसे, हमने दस लाख रुपए का 5% हिस्सा ट्रेडिंग के लिए रखा है तो हमारी ट्रेडिंग पूंजी हुई 50,000 रुपए। पहले से निर्धारित है कि इसका 1% से ज्यादा रिस्क किसी ट्रेड में नहीं उठाएंगे। 50,000 रुपए का 1% निकालने पर रकम बनती है 500 रुपए। इस तरह अनुशासन बना कि किसी भी ट्रेड में 500 से ज्यादा नहीं डुबाना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कुल पूंजी दस लाख रुपए है तो 50,000 रुपए ही ट्रेडिंग में लगाएं। अगर जोखिम उठाने की क्षमता ज्यादा हो तो पूंजी का 5% से ज्यादा हिस्सा भी लगा सकते हैं। रिस्क संभालने का दूसरा चरण है: किसी भी ट्रेड में ट्रेडिंग पूंजी का 1% से ज्यादा हिस्सा दांव पर कतई न लगाएं। सीखने की शुरुआत में इसे 0.5% तक रखना ज्यादा मुनासिब होगा। मसलन, 50,000 रुपए में से 500 या 250 रुपए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए स्टॉक का चयन महत्वपूर्ण है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है रिस्क का प्रबंधन। इसके दो मौलिक सिद्धांत हैं। पहला, किसी भी ट्रेड में अपनी पूंजी के एक निश्चित हिस्से से ज्यादा न लगाएं। दूसरा, किसी ट्रेड में उठाया जानेवाला रिस्क सारी पूंजी की तुलना में बहुत कम हो। इसको अपनाने के चार चरण हैं। पहला चरण है शेयरों में निर्धारित निवेश का 5% से ज्यादा ट्रेडिंग में न लगाएं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ट्रेडिंग में जो भी ब्रोकर या संस्थाएं असल में कमाते हैं, वे कभी टिप्स का सहारा नहीं लेते; बल्कि उनकी कमाई को कामयाब बनाने के लिए हमारे-आप के बीच टिप्स का जाल फेंका जाता है क्योंकि उनके सौदों को पूरा करने के लिए सामने आ जाएं। यकीनन, वे भी भविष्य की अनिश्चितता झेलते हैं और उसके जोखिम को संभालकर ही कमा पाते हैं। इस हफ्ते हम जोखिम संभालने की रणनीतियां समझेंगे। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

भविष्य में वही ट्रेडर बाज़ार में टिक पाएगा जो उपलब्ध डेटा के गहन विश्लेषण को इंसान की सहज बुद्धि व आर्थिक समझ से मिलाकर अपने सौदे तय कर सकेगा। डेटा जुटाना और उसका हर कोण से विश्लेषण करना उसकी उंगलियों के पोरों का खेल होना चाहिए। यह काम वो कंप्यूटर व सॉफ्टवेयर की मदद से कर लेगा। फिर उसमें जब वो इंसानी बुद्धि का तड़का लगाएगा तब समय उसका पूरा साथ देगा। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी