दुनिया के विकसित बाज़ारों का पता नहीं, लेकिन भारत जैसे विकासशील बाज़ार में बड़े निवेशकों या संस्थाओं की तिकड़मबाज़ी खूब चलती है। आपने देखा होगा कि अक्सर ढाई बजे के आसपास सेंसेक्स व निफ्टी का रुख तेज़ी से पलट जाता है। इसे बाज़ार के लोग फैंटम प्रभाव कहते हैं। इसके अलावा बाज़ार में बड़े-बड़े ऑपरेटर बैठे हैं जो चुनिंदा शेयरों में खेलते हैं। फाइनेंस, रियल्टी व मेटल कंपनियां इनकी मुट्ठी में रहती हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अगर आपको लगता है कि शेयरों के भाव आज, दो-चार या दस दिन बाद कहां जानेवाले हैं, इसका पता लगाने की कोई विद्या या विज्ञान है तो यह भ्रम दिमाग से खुरच-खुरचकर निकाल दीजिए। यहां कुछ भी पक्का नहीं। बस, अंदाज लगाया जाता है। हर कोई पुराने पैटर्न के टुकड़े पकड़कर आगे का अंदाज़ लगाता है। यह मूलतः विशुद्ध सट्टेबाज़ी है। लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का। हां, तिकड़मबाज़ी खूब चलती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्टॉप-लॉस के अलावा शेयर बाजार की ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने के और भी तरीके हैं। मसलन, पूरी ट्रेडिंग पूंजी को बीस या उससे ज्यादा हिस्से में बांट लें और एक ट्रेड में केवल एक हिस्सा लगाएं। इसे पोजिशन साइजिंग कहते हैं। अन्य नियम है कि एक सौदे में 2% और महीने में 6% स्टॉप-लॉस लग जाए तो मन बेचैन हो जाता है। ऐसे में फौरन उस महीने भर ट्रेडिंग रोक देनी चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग के बिजनेस की लागत ही नहीं है, बल्कि वह इस बिजनेस में आपके समझदार दोस्त का भी काम करता है। बल्कि, जब आप रिस्क में फंसते हो तो स्टॉप-लॉस सबसे अच्छे दोस्त की तरह आपको उबार लेता है। इसलिए स्टॉप-लॉस हमेशा सौदा करने से पहले स्टॉक के स्वभाव और अपने रिस्क प्रोफाइल पर विचार के बाद तय कर लेना चाहिए। फिर बिना कई ढील दिए कड़ाई से उसका पालन करना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में उतरनेवाले कुछ लोग खुद को बड़ा तीसमार-खां समझते हैं। वे स्टॉप-लॉस लगाने की जहमत नहीं उठाते। भूल जाते हैं कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग भी एक बिजनेस है और हर बिजनेस की कुछ न कुछ लागत होती है। स्टॉप-लॉस शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के बिजनेस की लागत है जिसे चुकाने से कोई भी नहीं बच सकता। बराबर बढ़ता शेयर अचानक झटका खाने पर सारी पूंजी सोख लेता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग बहुत रिस्की बिजनेस है। खासकर, रिटेल ट्रेडरों के लिए तो बहुत ही ज्यादा। यहां बड़े-बड़े मगरमच्छ घात लगाए बैठे हैं जो जोश में उछलते-कूदते नौसिखिया ट्रेडरों को फौरन निगल जाते हैं। ट्रेडिंग के रिस्की बिजनेस में जो जहां तक रिस्क को संभाल पाता है, वहां तक कमाता है। यहां से कमाने का यही मूलमंत्र है। जो रिस्क की परवाह नहीं करता, वो यहां अपनी सारी पूंजी डुबा डालता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में नई-नई दिलचस्पी जगे और दो-चार दिन टॉप-गेनर्स की लिस्ट देखें तो मन में लालच जग उठता है कि हर दिन 2% भी कमाए तो महीने भर का 40% और साल का 480% हो जाएगा। ट्रेडिंग से अपना धन साल भर में लगभग पांच गुना! मौजा ही मौजा!! लालच का सुरूर ऐसा कि दिखता ही नहीं कि इतनी कमाई में कितना भयानक रिस्क है। इतना रिस्क कि सारी-की-सारी पूंजी डूब जाए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सरकार अगर वाकई कुछ करना चाहती तो वह केंद्र और राज्य सरकारों में इस समय खाली 24 लाख से ज्यादा पदों को फौरन भरने का इंतज़ाम कर देती। लेकिन उसने एनएसएसओ की वह रिपोर्ट ही दबा दी जिसमें खुलासा हुआ कि 2017-18 में देश में बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। दिक्कत यह है कि मोदी सरकार को ठोस काम के बजाय नए-नए जुमलों पर ज्यादा यकीन है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पीयूष गोयल कहते हैं कि बजट में संख्याओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है क्योंकि प्रधानमंत्री ईमानदार बजट चाहते थे। लेकिन जानकार बताते हैं कि इसमें इतनी बेईमानी बरती गई है कि यह बजट नहीं, फजट बन गया है। आईडीबीआई के लिए एलआईसी से वसूले गए 65,000 करोड़ को छोड़ दें, केवल एफसीआई की 1.40 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी को जोड़ दे तो राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4% हो जाता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पेंशन का सब्जबाग फेंका गया है। लेकिन यह पेंशन इस समय बूढ़े हो रहे मजदूरों को नहीं, बल्कि अभी 29 साल के उस मजदूर को 60 साल का होने पर मिलेगी, जो प्रतिमाह 100 रुपए अपने पेंशन खाते में डालेगा। 8% सालाना ब्याज पर मजदूर की यह बचत 30 साल में 1.50 लाख रुपए हो जाएगी। इस पर सरकार उसे 3000 रुपए प्रतिमाह पेंशन देगी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी