विदेशी निवेशक ही नहीं, देश के स्मार्ट निवेशकों ने भी शेयर बाज़ार में अब निचले स्तर पर खरीद शुरू कर दी है। वे ऐसे समझदार निवेशक हैं जो बाज़ार, अर्थव्यवस्था और कंपनियों की गहरी समझ रखते हैं। राकेश झुनझुनवाला जैसों की तरह शोर नहीं मचाते, न ही प्रवर्तकों से डील करते हैं, बल्कि चुपचाप स्तरीय कंपनियों में करोड़ों का निवेश करते रहते हैं। अक्सर वे ऐसा प्राइवेट इक्विटी फर्मों के जरिए करते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफआईआई ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश बढ़ा दिया है। बजट के बाद जहां जुलाई व अगस्त में उन्होंने यहां से क्रमशः 12,419 करोड़ व 17,592 करोड़ रुपए निकाले थे, वहीं सितंबर में उन्होंने 7548 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। हो सकता है यह उन पर घटाए गए टैक्स का नतीजा हो। लेकिन उनके बदले रुख को एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दो दिन पहले ही हमने उस बापू की 150वीं जयन्ती मनाई जिन्होंने स्वदेशी का परचम बुलंद किया था। लेकिन आज सरकार स्वदेशी पूंजी को छोड़ विदेशी पूंजी के पीछे भाग रही है। वहीं, तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां टैक्स चोरी का धन एफडीआई की खोल में दुनिया भर में घुमा रही हैं। आईएमएफ के मुताबिक 38% एफडीआई ऐसा ही है। फिर भी हमारी सरकार इस पूंजी से रोजगार पैदा करने का दम भरती रही है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सारे विदेशी निवेश का चरित्र आज संदिग्ध हो गया है। आईएमएफ के एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक साल 2017 में दुनिया में 15 लाख करोड़ डॉलर या 38% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश फैंटम या छलिया पूंजी के रूप में आया था। यह रकम उस साल चीन व जर्मनी के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। इस छलिया पूंजी का 85% से अधिक हिस्सा मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग, सिंगापुर, नीदरलैंड व स्विटज़रलैंड जैसे दस देशों से आया था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के मुताबिक 31 अगस्त 2019 तक देश में 9416 विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक सक्रिय हैं। इन्हें FPI या FII भी कहा जाता है। इनके पास अगस्त में निवेश की खातिर 31.98 लाख करोड़ रुपए थे जिसका 86% यानी 27.52 लाख करोड़ रुपए इक्विटी या शेयरों के लिए था। इसमें सबसे ज्यादा धन अमेरिका और उसके बाद फर्जी धन के गढ़ कहे जानेवाले मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग व सिंगापुर से आया है। अब मंगल की दृष्टि…और भीऔर भी

पहले देश में विदेशी वस्तुओं का क्रेज़ था। अब विदेशी पूंजी का क्रेज़ चढ़ गया है। इसे खींचने की लालसा आमलोगों से कहीं ज्यादा सरकार में है। हमारे प्रधानमंत्री खुद घूम-घूमकर विदेशी निवेशकों को न्यौता दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें कोई दिक्कत होगी तो वे संभाल लेंगे। विदेशियों से इतना अपनापा ठीक नहीं क्योंकि वे भारत या भारतवासियों का नहीं, अपना फायदा देखकर ही यहां धन लगा रहे हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दिक्कत यह है कि आम भारतीय जिस एलआईसी को गाढ़े-वक्त का साथी मानते हैं, उसे हमारी सरकार ने अपना एटीएम बना रखा है। जहां कहीं निवेश करना हो, वह एलआईसी की गाढ़ी निधि का सहारा लेने लगी है। यहां तक कि सरकारी कपंनियों के शेयर बेचने या विनिवेश के कार्यक्रम में कोई नहीं मिला तो सारी बिक्री एलआईसी के मत्थे मढ़ दी जाती है और एलआईसी को मजबूरन उनका दाम चुकाना पड़ता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

एलआईसी के प्रति आम भारतीय निवेशकों में अविश्वास पैदा करना लगभग असंभव है। बैंकों व पोस्ट ऑफिस की सुरक्षित जमा के बाद लोगों के जेहन में एलआईसी का ही नंबर आता है। आम भारतीय पीढ़ियों से एलआईसी की पॉलिसी को सोने या फिक्स डिपॉजिट रसीद की तरह लॉकर में सुरक्षित रखते आए हैं। यह अलग बात है कि वे इसे निवेश मानते हैं, जबकि असल में वह जोखिम का बीमा कवच मात्र है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले हफ्ते कांग्रेस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि सरकार एलआईसी के धन का दुरुपयोग कर रही है और किसी दिन हालत ऐसी हो सकती है कि एलआईसी को बंद करना पड़ जाए। लेकिन यह आशंका काफी अतिरंजित लगती है। फिलहाल एलआईसी का बिजनेस मॉडल सुरक्षित नज़र आता है। वह अपने कुल निवेश का लगभग 65% हिस्सा केंद्र व राज्य सरकार के सुरक्षित व अधिक ब्याज वाले बॉन्डों में लगाती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2019-20 में एलआईसी को 3.49 लाख करोड़ रुपए का निवेश करना है। यह रकम वह सरकारी प्रतिभूतियों, कॉरपोरेट बांडों व शेयरों समेत पूंजी बाज़ार के सभी प्रपत्रों में लगाएगा। इसमें से कितना धन कहां लगाया जाएगा, इसका पता नहीं। लेकिन बीते वित्त वर्ष 2018-19 में उसने 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा केंद्र व राज्य सरकारों के बॉन्डों में लगाए थे और उन पर लगभग 8.25% का रिटर्न कमाया था। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी