एक जमाना था, जब लोग अपनी धन-संपदा तिजोरियों में, ज़मीन के नीचे या दीवारों में छिपाकर रखते थे। लेकिन आज धन-संपदा बहती हुई धारा बन गई है। जिनमें हुनर है वे उस धारा में से जब चाहें, मनचाही मात्रा निकाल लेते हैं और जिनमें ऐसा हुनर नहीं है, वे अपनी टूटी किस्मत का रोना रोते रह जाते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग बहती धारा से धन निकालने का ऐसा ही एक ज़रिया है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कहां तो अर्थव्यवस्था को हर साल कम से कम 8% की दर से बढ़ना था और कहां उसकी विकास दर 4-5% तक गिर गई। वह भी तब, जब जीडीपी की गणना का तरीका बदल दिया गया। राजनीति में लंबी जुबान या लफ्फाजी चल जाती है। लेकिन अर्थनीति में बड़बोलापन करोड़ों लोगों की ज़िंदगियां तबाह कर देता है। नोटबंदी ने जिन लाखों छोटे उद्योगों की कमर तोड़ी, वे आज तक नहीं उठ पाए हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2024 तक भारत को 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का दावा कर रखा है। ये उसी तरह का दावा है जैसे साल 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने था। हकीकत यह है कि पिछले पांच सालों में किसानों की आय घटती जा रही है। लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा होने का मतलब है भारत की सारी चमक का उड़ जाना और बेरोजगारी की महामारी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था की हालत की समग्र तस्वीर पेश करता है सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी। चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में यह 5% बढ़ा था जो 24 तिमाहियों की न्यूनतम विकास दर थी। लेकिन सितंबर तिमाही की विकास दर इससे भी बदतर होने का अंदेशा है। एसबीआई के 4.2% के बाद नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकनॉमिक रिसर्च का अनुमान 4.9% का है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जो एसबीआई पहले सरकार का पक्ष लेकर अभी तक अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी बताता रहा था, वह भी अब अपना टेम्पो नहीं बनाए रख पा रहा है। वह सबसे बड़ा बैंक और सरकारी ही नहीं, सरकार के सारे खाते संभालने वाला बैक भी है। जहां सब उम्मीद कर रहे थे कि पहली तिमाही में 5% तक डूबी विकास दर दूसरी तिमाही में 5.5% हो सकती है, वहीं एसबीआई का अनुमान 4.2% का है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

इस बार का त्योहारी सीज़न खराब रहा। आम उपभोक्ता से लेकर उनके लिए सामान बनानेवाली कंपनियों के लिए। फिर भी इसे तात्कालिक मामला मानकर छोड़ा जा सकता है। लेकिन जब देश मे डीजल से लेकर बिजली तक की मांग घट रही हो और आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हों तो यह गंभीर चिंता का मसला बन जाता है। शेयर बाज़ार भले ही ऊपर से बेफिक्र दिखे, लेकिन अंदर-अंदर उसकी भी हालत खराब है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की हालत सुधर नहीं रही तो सभी निवेशक सुरक्षित ठिकानों की तरफ भाग रहे हैं। उन्हें स्थापित व बड़ी कंपनियों में सुरक्षा दिखती है जो निफ्टी व सेंसेक्स में शामिल हैं। आम निवेशकों के धन से बने म्यूचुअल फंड भी मंहगे हो जाने के बावजूद इन्हीं में निवेश बढ़ा रहे हैं। पिछले 22 महीनों में उन्होंने बाज़ार में 1.78 लाख करोड़ रुपए डाले हैं, जबकि एफआईआई निवेश 37,381 करोड़ रुपए रहा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में पिछले 22 महीनों में सबसे ज्यादा मार स्मॉल और मिडकैप स्टॉक्स को झेलनी पड़ी है। जहां विदेशी व देशी धन लार्जकैप कंपनियों की तरफ बहता रहा, वहीं स्मॉल व मिडकैप कंपनियों का कोई पुछत्तर नहीं रहा। इससे अच्छा बिजनेस कर रही छोटी व मध्यम कंपनियों के भी शेयर गिरते रहे। उनसे और ज्यादा निवेश निकला, जबकि बड़ी कंपनियों में निवेश बढ़ता ही गया और उनके शेयर चढ़ते ही गए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

धन के प्रवाह से पूरा शेयर बाज़ार नहीं, उसका छोटा-सा हिस्सा चढ़ा है। एनएसई की 1500 से ज्यादा कंपनियों के एक सैम्पल के अध्ययन से पता चलता है कि उनके शेयरों के भाव जनवरी 2018 के बाद से औसतन 44% गिर चुके हैं। इस गिरावट का मध्यमान या मीडियन निकालें तो वह 53% निकलता है। हां, इतना जरूर है कि शीर्ष की 100 कंपनियों में से 55 के शेयर जमकर चढ़ गए हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2019-20 में अब तक म्यूचुअल फंड उद्योग में प्रति माह औसतन 9.24 लाख एसआईपी खाते जुड़े हैं। इनमें से हर एसआईपी खाते से महीने में होनेवाला औसत निवेश 2900 रुपए का है। फिलहाल स्थिति यह है कि म्यूचुअल फंडों को प्रति माह एसआईपी से लगभग 8000 करोड़ रुपए का निवेश मिल जा रहा है। माल कम बिक रहा हो, अर्थव्यवस्था सुस्त हो, फिर भी बाज़ार में निवेश आ रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी