इस साल मार्च से अब तक विदेशी निवेशक संस्थाओं ने शेयर बाज़ार में शुद्ध रूप से 14,139 करोड़ रुपए डाले हैं, जबकि इसी दौरान घरेलू निवेशक संस्थाओं का शुद्ध निवेश 49,261 करोड़ रुपए रहा है। दोनों का शुद्ध निवेश मिलाकर 63,400 करोड़ रुपए। वहीं, सेंसेक्स और निफ्टी 23 मार्च को तलहटी पकड़ने के बाद से क्रमशः 48.94% और 50.02% बढ़ चुके हैं। सरकार परेशान है कि किसका धन आने से बाज़ार बढ़ा है! अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। उठना-गिरना उसका स्वभाव है। खरीदने का पलड़ा भारी तो बढ़ता है, अन्यथा गिरता है। इधर एफआईआई/एफपीआई बराबर बेच रहे हैं। मगर बाज़ार ज्यादा गिर नहीं रहा। बढ़ रहा या सपाट बंद हो रहा है। समझना ज़रूरी है कि इस समय किसकी खरीद से बाज़ार संभला हुआ है? अभी वे खरीद रहे हैं जिन्होंने पहले बेच रखा है और शॉर्ट कवरिंग से मुनाफा कमा रहे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बढ़ता, रुकता, गिरता। इन दिनों बाज़ार की यही चाल है। साथ ही वोलैटिलिटी या चंचलता काफी बढ़ी हुई है। निफ्टी अमूमन 120-140 अंकों के दायरे में घूमता है। वैसे तो अब देश में कोरोना के पीक से उतरने के संकेत मिल रहे हैं। लेकिन कोरोना का दूसरा झटका आया तो निफ्टी कहां तक गिर सकता है? हल्का आया तो 10,200 तक और तगड़ा झटका आया तो 9600 तक! जानकारों का यही अनुमान है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हिचकोले खाते बाज़ार को लेकर तरह-तरह की गणनाएं और कयास चल रहे हैं। कुछ उस्ताद फिबोनाकी संख्याओं के आधार पर बोले कि निफ्टी में 10,800 के आसपास सपोर्ट मिल रहा था तो बीते हफ्ते गुरुवार को 10,805.55 पर बंद होने के बाद उसमें दो दिन से उछाल चल रहा है। टेक्निकल एनालिसिस वालों का कहना है कि निफ्टी में 200 दिनों का मूविंग औसत 10,820 का था तो वहां से सपोर्ट मिल गया। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया के वित्तीय जगत में बढ़ती उथल-पुथल, कोरोना के बढ़ते मामले और अर्थव्यवस्था सुधरने की संभावनाओं पर उठते सवालों ने अपने यहां शेयर बाज़ार के उफान को धीमा कर दिया है। कमोबेश सभी को अंदेशा है कि अब बाज़ार में बड़ा करेक्शन आ सकता है और मार्च के बाद के छह महीनों में फूला गुब्बारा पिचक सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उन्माद की अवस्था से निकलकर सावधानी की मुद्रा अपना लें। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अभी तक व्यवस्था थी कि जब तक खरीदे गए शेयर आपके डीमैट खाते में नहीं आते, तब तक आप उन्हें बेच नहीं सकते थे। लेकिन नई व्यवस्था में अगले ही दिन उन्हें बेच सकते हैं, भले ही वो डीमैट खाते में नहीं आए हों। कुछ ब्रोकर सहूलियत दे रहे हैं कि शेयर-बिक्री की रकम आपके खाते में न आने पर भी आप उससे कैश या डेरिवेटिव सेगमेंट में नई पोजिशन ले सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

उधर आम निवेशक इस बात से परेशान हैं कि शेयर बेचने पर उनसे मार्जिन क्यों लिया जा रहा है। आखिर ब्रोकर के पास पावर ऑफ एटॉर्नी है। वह कोई रिस्क नहीं उठाता, न उसके डिफॉल्ट की गुंजाइश है। इधर, इंट्रा-डे ट्रेडर भी सेबी के नए नियम से दुखी हैं। अभी तक ब्रोकर उन्हें इंट्रा-डे अर्जित लाभ पर उसी दिन नई पोजिशन लेने की इजाज़त दे देता था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सब धान बाइस पसेरी तौलना पुरानी कहावत है। लेकिन सेबी ने कैश सेगमेंट की मार्जिन ट्रेडिंग में कुछ ऐसा ही नियम बनाया है। चाहे नए शेयर खरीदें या पोर्टफोलियो के पुराने शेयर बेचें, दोनों ही हालत में आपको मूल्य का 20% हिस्सा शुरूआत में बतौर मार्जिन दे देना होगा। खरीदने पर मार्जिन देने की बात समझ में आती है। लेकिन जब हम शेयर बेच रहे हैं, तब मार्जिन जमा करने का क्या तुक! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

गिरवी रखे शेयरों की नई प्रक्रिया के बारे में आपके ब्रोकर ने सारा ब्योरा आपको बता दिया होगा। ओटीपी से पुष्टि करने पर ही आपके शेयर ब्रोकर के खाते में जाएंगे। अन्यथा आपके डीमैट खाते में पड़े रहेंगे। असली मसला है कैश सेगमेंट में मार्जिन ट्रेडिंग के नए नियम। ब्रोकर इनका विरोध कर चुके हैं। अब कुछ ट्रेडरों का भी कहना कि सेबी ने इन्हें आसान बनाने के बजाय बहुत उलझा दिया है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में मार्जिन ट्रेडिंग और शेयरों को गिरवी रखे जाने संबंधी नियम बदल दिए गए हैं। पहले ब्रोकरों को जो अबाधित अधिकार मिले थे, उन्हें अब खत्म कर दिया गया है और आपकी इजाजत के बिना ब्रोकर कुछ नहीं कर सकता। नए नियमों में जहां निवेशक को ज्यादा ताकत दी गई है, वहीं ब्रोकरों से जुड़े तंत्र को ज्यादा पारदर्शी बना दिया है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी