कहां ट्रेडिंग करे, कौन-सा स्टॉक खरीदें या स्टॉक्स को छोड़ इंडेक्स डेरिवेटिव्स में ट्रेड करे? इन बातों पर प्रोफेशनल सलाह आप कहीं से ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए आप साल की एक लाख रुपए फीस दें या महीने के 1100 रुपए, इन सलाहों से कमाना आपकी कुशलता और अनुशासन पर निर्भर करता है। बाहरी सलाह महज एक इनपुट है। बाकी सारा काम आपकी सर्तकता, समझ और निर्णय लेने की क्षमता करती है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए बाज़ार के सामान्य होने का इंतज़ार करना चाहिए। इस बार बाज़ार गिरा तो गहरा आघात लगा सकता है। लेकिन कहां तक गिरने पर बाज़ार को सामान्य या स्थिर माना जाएगा। जानकारों के मुताबिक, निफ्टी गिरते-गिरते जब 11,200 से 11,350 की रेंज में आ जाए, तब माना जाएगा कि वह सामान्य अवस्था में लौट आया। फिलहाल ऐसा होने में देर है। तब तक रिटेल ट्रेडरों को दूर से तमाशा देखना होगा। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

यह सावधानी बरतने का दौर है क्योंकि शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था या कंपनियों की ताकत पर नहीं, बल्कि तुरत-फुरत मुनाफा कमाने के लिए लगी उधार की पूंजी के दम पर उछल रहा है। यह भी रिवाज़ है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों तक बाज़ार को जबरन चढ़ाकर रखा जाता है। ऊपर से इधर कोरोना का नरम-गरम जारी है। ठंड बढ़ने पर कोरोना का प्रकोप विकट होने की आशंका है। फिर ट्रेड ही क्यों करें? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

भीषण है यह दुष्चक्र। ज्यादा उफान ट्रेडरों को किनारे लगा देता है। लेकिन किनारे लगे ट्रेडर ज़ोर से पलटते हैं। इस छपाक-झपाक में उफान और ज्यादा बढ़ जाता है। दैनिक वोलैटिलिटी या चंचलता पहले से ज्यादा हो जाती है। हमें VIX सूचकांक से नापी जाने वाली और इस सांख्यिकी चंचलता का अंतर समझना होगा। इस समय VIX वाली वोलैटिलिटी घटकर 20-22% की रेंज में आ चुकी है जिसे खतरनाक नहीं माना जा सकता। अब बुद्ध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की शांत और उफनती धारा में क्या अंतर है? मोटेतौर पर जब निफ्टी दिन में 90-100 अंकों के दायरे में चले तो बाज़ार की धारा शांत मानी जा सकती है। वहीं, जब वह 120 अंकों के ज्यादा के दायरे में उछलता-कूदता है, तब बाज़ार की धारा उफनती मानी जा सकती है। फिलहाल औसतन यही स्थिति चल रही है। ट्रेडरों को घाटा, फिर उसे कवर करने की मशक्कत। बनता जाए घनघोर दुष्चक्र। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आसानी से कमाना कौन नहीं चाहता! लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना हर किसी के बूते की बात नहीं। यहां हाथी जैसी सुस्ती नहीं, चीते जैसी फुर्ती चाहिए। नहीं तो बाज़ार के मगरमच्छ पलक गिरते आपको निगल जाएंगे। शेयर बाज़ार ऐसा शांत तालाब नहीं कि कांटा लगाकर बैठ गए और इंतज़ार किया तो मछली हाथ लग जाएगी। यहां तो ट्रेडर उफनती धारा में शिकार करते हैं। जितना ज्यादा उफान, उतनी ज्यादा कमाई। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट और लॉन्ग दोनों तरह के सौदे लीवरेज्ड होते हैं। जितना धन लगाया है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा असल सौदा होता है। लेकिन मार्क-टू-मार्केट भुगतान के दबाव में लॉन्ग सौदे करने वाले ट्रेडर को मजबूरी में अपनी पोजिशन छोड़नी होती है तो बाज़ार गिर जाता है। वहीं, शॉर्ट सेलिंग करने वाले ट्रेडर को अक्सर अपनी पोजिशन कवर करने के लिए घबराहट में खरीदना पड़ता है तो बाज़ार चढ़ जाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार की सांस इधर बहुत तेजी से उठ-गिर रही है। निफ्टी प्रतिदिन औसतन 120 से 160 अंक ऊपर-नीचे होता है। सीमित खरीद में बाज़ार चढ़ता है तो भारी वोल्यूम के साथ गिर जाता है। इस समय हालत यह है कि गिरते वक्त केवल कैश सेगमेंट में ही वोल्यूम नहीं बढ़ता, डेरिवेटिव सेगमेंट में ओपन इंटरेस्ट भी बढ़ जाता है। मतलब, शॉर्ट सेलिंग करनेवाले बाज़ार गिरने की उम्मीद में सौदे बढ़ाते जा रहे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी निवेशक बाहर से सस्ते उधार का धन ला रहे हैं। देशी संस्थाएं आम लोगों से सस्ते में मिला धन लगा रही हैं। अपने बाज़ार में उधारी का एक अलग खेल डेरिवेटिव सौदों के रूप में चलता है जिन्हें लीवरेज्ड सौदे भी कहते हैं। एक रुपए लगाकर पांच से बीस गुना ज्यादा रकम का सौदा। कैश ही नहीं, फ्यूचर्स सेगमेंट में भी मार्जिन का जबरदस्त खेल। भाव बढ़े तो मार्क-टू-मार्केट की लटकी तलवार। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सीधी-सी बात है कि किसी शेयर/स्टॉक के भाव और शेयर बाज़ार के सूचकांक तभी बढ़ते हैं जब उन्हें खरीदनेवाले ज्यादा ही आतुर हों। लेकिन सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया में कोरोना का कहर बरपा हो और अर्थव्यस्था में धन भयंकर की तंगी हो, तब शेयरों को खरीदने इतना तगड़ा धन आ कहां से रहा है?  यह धन है अमेरिका, जापान और यूरोप से बेहद कम ब्याज पर लिए गए उधार का। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी