प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में वादा किया था कि सत्ता संभालने के बाद उनकी सरकार हर साल 2 करोड़ रोज़गार पैदा करेगी। रिजर्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट के बाद मोदी ललकारने लगे हैं कि पिछले तीन-चार साल में करीब-करीब 8 करोड़ नए रोज़गार बने हैं तो विपक्ष फालतू हल्ला मचा रहा है। लेकिन स्वतंत्र अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मोदी के दावे और रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से कतई सहमत नहीं हैं। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सस्टेनेबलऔरऔर भी

शक्तिकांत दास को मोदी सरकार ने 12 दिसंबर 2018 से जब से रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया है, तभी से उन्होंने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता व स्वतंत्रता को दरकिनार कर सरकार का दास बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। यह पद संभालने के बाद से अब तक वे रिजर्व बैंक के खज़ाने से 7,10,835 करोड़ रुपए केंद्र सरकार के हवाले कर चुके हैं। इस बीच 2021 में उन्हें तीन साल का पहला एक्सटेंशन मिल गया। उनकाऔरऔर भी

एक समय था, जब चीन से लेकर एशिया के तमाम देशों ने निर्यात के दम पर शानदार आर्थिक विकास हासिल किया। लेकिन जिस तरह यूरोप से लेकर अमेरिका तक सभी विकसित देशों में अर्थव्यवस्था व खपत ठहरी हुई है, उसमें भारत के लिए निर्यात के बलबूते अर्थव्यवस्था को तेज़ गति से बढ़ाना संभव नहीं है। फिर भी घरेलू बाज़ार और खपत पर फोकस करने के बजाय मोदी सरकार और उसके शागिर्द अर्थशास्त्री निर्यात केंद्रित विकास का मंसूबाऔरऔर भी

झूठ और भ्रम के पांव नहीं होते। वो पल भर में उड़कर कहीं से कहीं पहुंच जाते हैं। लेकिन झूठ और भ्रम का स्रोत अगर देश की सरकार ही बन जाए तो उस देश का बेड़ा गरक होने लगता है। केंद्र सरकार का एक मंत्रालय है सांख्यिकी व कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय। इसने देश के आर्थिक व औद्योगिक विकास का दो तरह का डेटा पेश किया है। एक है नेशनल एकाउंट्स स्टैटिसटिक्स (एनएएस) और दूसरा है एनुअल सर्वेऔरऔर भी

मोदी सरकार ने चीन के साथ घृणा व प्रेम का विचित्र रिश्ता बना रखा है। सैटेलाइट तस्वीरें बताती है कि चीन लद्दाख में भारतीय सीमा के भीतर अवैध निर्माण कर रहा है। खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सितंबर 2020 में राज्यसभा में बताया था कि चीन ने लद्दाख में भारत की 38,000 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। राजनीतिक रूप से चीन को भारत का नंबर-एक दुश्मन माना जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदीऔरऔर भी

मॉरगन स्टैनली रिसर्च का अनुमान है कि भारत तीन साल बाद 2027 में ही जापान व जर्मनी को पीछे छोड़ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। साथ ही साल भर के भीतर बीएसई सेंसेक्स 82,000 अंक के पार जा सकता है। यह एक विदेशी ब्रोकरेज़ फर्म की सदिच्छा या मार्केटिंग पैंतरा है। हो सकता है कि ऐसा हो भी जाए। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था अंदर से तब मजबूत होगी, जब उसकी बुनियाद सत्यनिष्ठा व ईमानदारीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार देश में राजनीतिक स्थिरता चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने एनडीए सरकार में जिस तरह टीडीपी और जेडी-यू की बैसाखियों पर निर्भरता के बावजूद वित्त व कॉरपोरेट मामलात, वाणिज्य व उद्योग, रेल, राजमार्ग, पोर्ट व शिपिंग, डिफेंस, शिक्षा, आईटी और सूचना प्रसारण जैसे तमाम अहम मंत्रालय अपने पास रखे हैं, उससे बाज़ार को निरतंरता का यकीन हो गया है। इसलिए देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र को लगता है कि मोदी सरकार अपने तीसरेऔरऔर भी

देश में काम का और काम भर का रोज़गार तब तक नहीं पैदा होगा, जब तक मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र जमकर नहीं बढ़ता। जीडीपी बढ़ रहा है। लेकिन उसमें मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान नहीं बढ़ रहा। मनमोहन सरकार ने 2012 में इसे 2022 तक 25% और मोदी सरकार ने 2014 में इसे 2025 तक 25% पर पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन यह 2012 में 16% था और अब भी 16% के आसपास अटका है। दरअसल जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंगऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो देश में रोज़गार की कहीं कोई कमी नहीं है। परसों लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र ने 18 सालों का रिकॉर्ड रोज़गार पैदा किया है। लगा जैसे कि वे सरकार का कोई आंकड़ा दे रहे हों। लेकिन वे दरअसल 23 मई को आए विदेशी बैंक एचएसबीसी के परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के आधार पर यह दावा कर रहे थे। इस इंडेक्स में कोई आंकड़ाऔरऔर भी

विचित्र-सी हकीकत है कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। भारत का जीडीपी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है। लेकिन आम लोगों की खपत घटती जा रही है। सरकार की तरफ से 31 मई 2024 को जारी अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक इसे दर्शानेवाला निजी अंतिम खपत खर्च (पीएफसीई) वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी का 58.1% हुआ करता था, जबकि 2023-24 तक घटकर 55.8% रह गया है। निजी खपत बढ़ेगी नहीं तो निजी उद्योगऔरऔर भी