शरीर है, तभी सब है। घर-परिवार। सुख-समृद्धि। ज्ञान-ध्यान। सबकी शुरुआत इसी से होती है और इसी के साथ इससे जुड़े हर भाव का अंत हो जाता है। बर्तन ही नहीं तो अमृत रखेंगे कहां? इसलिए सबसे पहले शरीर की शुद्धता व पात्रता जरूरी है।और भीऔर भी

पीपल और बरगद दीवारों व छतों तक पर मजे से उग जाते हैं। लेकिन सायास गमलों में लगाओ तो सूखने लगते हैं। असल में हम उन्हें वो संतुलन नहीं दे पाते जो वे प्रकृति प्रदत्त गुण से खुद बना लेते हैं।और भीऔर भी

गमले में पौधे और बोनसाई ही उगते हैं, पेड़ नहीं। इसी तरह विचार व्यवहार की आंधियों में पलते हैं, बंद कोटरों में नहीं। दुनिया के झंझावातों में निखरते हैं, इतिहास के थपेड़ों से संवरते हैं विचार।और भीऔर भी