शेयरों के भाव कभी सीधी रेखा में नहीं, बल्कि लहरों जैसे चलते है। इन लहरों पर अच्छी सवारी गांठनेवाले लोग कमाते हैं, वहीं बिना सोचे-समझे लहरों पर कूदनेवाले डूब जाते हैं। एक और अकाट्य सच है कि भले ही ट्रेडिंग से कंपनियों के शेयरों के भावों की खोज होती है, लेकिन ट्रेडरों के लिहाज से इसमें दरअसल भावुक लोगों की जेब से धन निकलकर बुद्धिमान लोगों की जेब में जाता है, ज़ीरो-सम गेम। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पक्के ट्रेडरों के बीच में मान्यता है कि हर निवेशक मूलतः ट्रेडर होता है और ट्रेडिंग में फंस जाने पर मजबूरी में दीर्घकालिक निवेशक बन जाता है। लेकिन असलियत ऐसी नहीं। निवेश और ट्रेडिंग के मूलभूत सिद्धांत अलग हैं। दीगर बात है कि सुसंगत निवेश का समय घटकर अब दो साल और कुशल ट्रेडिंग इंट्रा-डे से निकल हफ्ते-दस दिन या एक-दो महीने की हो गई है। हमें यह बदलाव समझना चाहिए। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सफलता सरलता से पाई जाती है। अगर कामयाबी के चक्कर में जटिलता में उलझे हैं तो थोड़ा ठहरकर सोचिए कि कहीं आप कुछ गलत तो नहीं कर रहे। एक छोटी-सी मिसाल। कल हमने बाज़ार खुलने के पहले बेहद सरल गणनाओं से निकाला कि निफ्टी का संभावित दायरा 7945 से 8055 तक रह सकता है और वास्तविक रेंज 7944.85 से 8057.70 की रही। खैर, इसका मतलब यह नहीं कि सब पहले से तय है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ग्रीस का ऋण संकट। अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने का अंदेशा; इस पर इसी हफ्ते फेडरल रिजर्व अपनी बैठक के बाद बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा। घर के बादलों पर बाहर की अनिश्चितता की घटा। हालांकि मई में रिटेल मुद्रास्फीति के बढ़ने की चिंता पर अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन बढ़ने का उत्साह ज्यादा है। मगर बाज़ार की चाल को जितने कारक प्रभावित करते हैं, उन सभी को कोई नहीं पकड़ सकता। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

हाल-फिलहाल दो बार ऐसा हुआ जब बाज़ार तेज़ी से उठा तो लगा कि गिरावट का अंत हो गया। मगर अगले ही दिन यह आशा टूट गई। सवाल उठता है कि गिरावट का यह दौर कब तक चलेगा? सच है कि मोदी सरकार से तमाम अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, कंपनियों के नतीजे खराब हैं, मानसून भी खराब रहनेवाला है। लेकिन यह सारी नकारात्मकता तो बाज़ार जज्ब कर चुका है! भरोसा रखें। मौसम है, बदलेगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पुरानी कहावत है कि सब धान बाइस पसेरी नहीं होते। इसी तरह हर शेयर का अपना अलग स्वभाव होता है। उनकी चाल में भिन्नता होती है। वे अलग-अलग किस्म के ट्रेडरों या ऑपरेटरों को खींचते हैं। इसलिए हर किसी पर सामान्य नियम नहीं लागू होते। हमें ट्रेडिंग के लिए स्टॉक्स को चुनते वक्त उनके अलग स्वभाव और पैटर्न को समझना होता है। फिर अपने स्वभाव के हिसाब से उनकी लिस्ट बनानी होती है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कितने भी रिटेल ट्रेडरों से मिल लीजिए, कुछ महीने या साल भर सभी बम-बम करते मिल जाएंगे। लेकिन फिर ऐसा विलाप करते हैं कि मत पूछिए। घाटे में किसी की भी हालत ऐसी हो जाती है। वे कभी शांति से नहीं सोचते कि उनकी ऐसी दुर्दशा क्यों हुई। बजाय इसके वे दोबारा रातोंरात अमीर बनने के किसी धंधे को आजमाने निकल पड़ते हैं। ध्यान रखें कि प्रायिकता के खेल में निश्चितता नहीं होती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जिस वित्तीय बाज़ार में भाव एकाध नहीं, अनेकानेक कारणों से प्रभावित होते हैं, जहां भाव मुठ्ठीभर नहीं, बल्कि लाखों लोगों में बसी लालच व डर की भावना से तय होते हों, वहां भविष्य के भावों की गणना यकीनन हम-आप कर सकते हैं, लेकिन हमेशा उनका सटीक निकलना संभव नहीं। कुछ सौदे उल्टे पड़ सकते हैं। हम अधिक से अधिक इतना कर सकते हैं कि सौदे उल्टे पड़ें तो मार कम से कम लगे। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

मानसून की पहली बारिश ने माहौल में थोड़ी ठंडक घोल दी। लेकिन समग्र मानसून को लेकर चिंता बरकरार है। अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर भी पहले जैसा आशावाद नहीं बचा। विदेशी निवेशकों ने मई में पिछले 21 महीनों में पहली बार शेयर बाज़ार में शुद्ध बिकवाली की। ऐसे में हो सकता कि बाज़ार महीनों तक सीमित रेंज में बंधकर रह जाए। जाहिर है कि इस दौर में ट्रेडिंग की रणनीति अलग होनी चाहिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

ब्रोकरों के धंधे का मुख्य आधार हमारे निवेश या ट्रेडिंग से मिले ब्रोकरेज़ से कमाई करना है। वे अगर मुफ्त सलाह देते हैं तो उनका मकसद हमारा फायदा नहीं, बल्कि हमें सौदे करने के लिए उकसाना होता है। इसलिए उनकी सलाह पर आंख मूंदकर सौदे करना अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बेहतर यही है कि हम खुद अपने नियम व सिस्टम विकसित करें और उसके आधार पर सौदे करें। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी