लागत के बिना कोई बिजनेस नहीं होता। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग भी बिजनेस है। कितने पर खरीदा व बेचा, इस पर दोनों तरफ कितना ब्रोकरेज़ दिया और कितना टैक्स देना होगा, यह सारा कुछ जोड़कर पूरी लागत निकलती है। यह भी आंकना पड़ता है जितना समय ट्रेडिंग में लगाया, उतने समय कोई और काम करते तो हम कितना कमाते। यहीं पर अवसर लागत व आर्थिक मूल्य की धारणा काम आती हैं। अब देखते हैं गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी की अद्यतन सूचना के मुताबिक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में रजिस्टर्ड ब्रोकरों की संख्या 7306 और उनसे जुड़े सब-ब्रोकरों की संख्या 44,540 है। इस तरह करीब 52,000 लोग हैं जो चाहते हैं कि हम ज्यादा से ज्यादा ट्रेड करते रहें ताकि हर सौदे के ब्रोकरेज़ से उनका धंधा बढ़ता रहे। उनका स्वार्थ हमें लाभ कराने में नहीं, बल्कि अपने धंधे को बढ़ाने में है। अब आजमाते हैं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में कोई भी सौदा, चाहे वो बड़ी संस्था का हो या रिटेल निवेशक का, बिना ब्रोकर के नहीं होता। लेकिन ब्रोकर संस्थाओं के सौदों को ज्यादा ही तवज्जो देते हैं क्योंकि उनसे उन्हें बराबर व बड़ा धंधा मिलता है। इसीलिए वे अक्सर संस्थाओं का सौदा पूरा करने के लिए रिटेल निवेशकों का शिकार करते हैं। संस्थाओं की खरीद पर रिटेल निवेशक/ट्रेडर को बेचने और बिक्री पर खरीदने की सलाह देते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आज शाम जून की रिटेल मुद्रास्फीति के आंकड़े आएंगे। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि इसी के आधार पर रिजर्व बैंक ब्याज दर का फैसला करता है। ब्याज दर घटती है तो लोगबाग बैंक में जमा के बजाय अपना धन रियल एस्टेट या शेयर बाज़ार में लगाते हैं ताकि उन्हें ज्यादा रिटर्न मिल सके। इसीलिए ब्याज दर घटने पर अमूमन शेयर बाज़ार बढ़ता है। हालांकि चीन फिलहाल इस नियम का अपवाद है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में जो कुछ होता है, वो इंसान करते हैं, कोई भूत-भगवान या ग्रह-नक्षत्र नहीं। अल्गो ट्रेडिंग की प्रोग्रामिंग भी इंसान ही करते हैं। इन इंसानों की संख्या लाखों में हैं। बाज़ार के ग्लोबल हो जाने के बाद इनमें दक्ष लोग भी भरपूर हैं। अगर कोई इन सबकी भावनाएं भांप सके तो वो भावों का सटीक पूर्वानुमान लगा सकता है। लेकिन ऐसा संभव नहीं तो पिछले पैटर्न से काम निकालना पड़ता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में देशी या विदेशी संस्थाओं के अलावा ब्रोकरेज हाउसों और पंटरों का भी खूब खेल चलता है। अक्सर ये लोग प्रवर्तकों से मिलकर तूफान मचाते हैं। लेकिन वे बड़ी कंपनियों में खास कुछ नहीं कर पाते। उनका दायरा मिड, स्मॉल या माइक्रो कैप कंपनियों तक सीमित रहता है। इसलिए अक्सर देखने में आता है कि धंधे में पिटी कंपनियों तक के शेयर उछल जाते हैं। हमें उनसे दूर रहना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग दरअसल एक जंग है जिसमें हम विरोधी का धन निकालकर अपने खाते में खींच लेते हैं। इसलिए यह भलीभांति समझना ज़रूरी है कि हमारे सामने कौन है। यह जानना भी ज़रूरी है कि बाज़ार में असली असर देशी-विदेशी संस्थाओं की हरकतों का पड़ता है। रिटेल ट्रेडर कभी भी बाज़ार की दशादिशा तय नहीं करते। लेकिन हम तो अक्सर अंधेरे में तीर चलाते हैं। लगा तो तीर नहीं तो तुक्का! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर या किसी भी वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के पीछे मूल सोच होनी चाहिए न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न कमाने की जुगत निकालना। इसीलिए आम ट्रेडरों के लिए सिद्धांत यह है कि जिस दिन भी कोई खबर बड़ी आनेवाली हो, डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी का दिन हो, कंपनी के नतीजे आने हों, उस दिन ट्रेडिंग कतई ना करें। कारण, इन दिनों खबरों के अंधड़ में भावों में बड़ी उठापटक होती है। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

इंजीनियरिंग या मेडिकल जैसी किसी भी प्रोफेशनल पढ़ाई में चार-पांच साल लगते हैं। लेकिन वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग को हम लोग दाएं-बाएं हाथ का खेल समझते हैं, जबकि यह एक साथ साइंस और आर्ट दोनों ही है। इसमें इसके विज्ञान को समझने के साथ ही कला में भी महारत हासिल करनी पड़ती है जिसके लिए काफी अभ्यास की ज़रूरत पड़ती है। फिर, हमें अपने मन व भावनाओं को भी ट्रेन करना पड़ता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडर का ध्यान किसी और बात के बजाय हमेशा इस पर रहना चाहिए कि वो अपनी पूंजी पर कितना रिटर्न कमा पा रहा है। आपके कितने सौदे सही बैठे और कितने गलत, यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि जो सौदे सही बैठे, उनमें आपने कितना कमाया और जो गलत बैठे, उनमें कितना गंवाया। यह मेरा नहीं, बल्कि अब तक के सबसे बड़े ट्रेडर जॉर्ज सोरोस का नीति-वाक्य है। हमेशा इसे याद रखें। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी