निवेश में नियम है कि पहले कंपनी अच्छी तरह ठोंक-बजाकर चुनो। फिर कई महीने व साल तक निश्चिंत हो जाओ। इसी तरह स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड में भी बाज़ार को दिन में एक ही बार देखने के नियम का पालन करें। ट्रेडिंग करने लायक शेयर चुनें, अपनी पोजिशन चेक करें और अगले दिन शाम तक निश्चिंत हो जाएं। इससे फालतू का तनाव बच जाता है और आप सुसंगत निर्णय ले पाते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

टेक्नोलॉज़ी ने बहुत सारी चीजें आसान कर दी हैं। लेकिन ध्यान भटकाने के साधन भी बढ़ा दिए हैं। बाज़ार में हर किसी के पास स्मार्टफोन है। फेसबुक से लेकर ट्विटर तक फैला नेटवर्क है। ऐसे में एक काम पर फोकस करना बहुत मुश्किल है। हमारी इच्छा-शक्ति भी अक्सर जवाब दे देती है। ऐसे में कुछ साधनों को छोड़ना ही उचित है। जैसे, ट्रेडिंग के लिए स्मार्टफोन के बजाय कंप्यूटर को ही तवज्जो दें। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

घर का झगड़ा हो या कोई और लफड़ा। अगर आप तनाव में हों तो कड़ा नियम बना लें कि उस दिन ट्रेडिंग को हाथ नहीं लगाना है। असल में ट्रेडिंग अपने-आप में तनावपूर्ण काम है। इसलिए हमें दूसरी चीजों का तनाव न्यूनतम रखना चाहिए। नहीं तो आपके सीधे दांव भी उल्टे पड़ सकते हैं। ध्यान दें, ट्रेडिंग जूडो-कराटे जैसा खेल है जहां जो जितना शांत है, उसके जीतने की संभावना उतनी ज्यादा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

न तो दूसरे पर आंख मूंदकर भरोसा, न अपने पर अतिविश्वास। इन दोनों में संतुलन बनाकर ही हम बाज़ार की वास्तविक स्थिति को अभीष्टतम स्तर तक समझ सकते हैं। इस समझ तक पहुंचने की आवश्यक शर्त यह है कि हम खुद तनावमुक्त रहे क्योंकि क्योंकि तनाव में रहने पर हम छोटे से आवेग पर भी अपना संतुलन खो सकते हैं और गलत फैसले ले सकते हैं जिसके गलत होने की आशंका ज्यादा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दरअसल टिप्स का रगड़ा है ही ऐसा। जो लोग केवल टिप्स के दम पर ट्रेडिंग करना और कमाना चाहते हैं, उन्हें ट्रेडिंग का इरादा छोड़ ही देना चाहिए। हर टिप्स देनेवाला आपकी लालच पर धंधा करता है। आपका धन खींचना उसकी प्राथमिकता है, न कि आपको धन दिलाना। ट्रेडिंग में सफलता के लिए आपको अपना सिस्टम विकसित करना होगा। उसमें दूसरा मदद भर कर सकता है, नया इनपुट दे सकता है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

बहुतेरे लोग ब्रोकरों या बिजनेस चैनलों की ‘मुफ्त’ टिप्स पर भरोसा करते हैं। भूल जाते हैं कि आज के ज़माने में जो चीज़ मुफ्त होती है, उसमें असली माल या उत्पाद आप होते हैं जिसकी संख्या-शक्ति को बेचा जाता है। कुछ लोग तथाकथित विशेषज्ञों की टिप्स के लिए 20-25 हज़ार तक फीस देते हैं। थोड़ा सही, ज्यादा गलत के चक्कर में वहां भी आखिरकार पूंजी डूब जाती है। फिर जाएं तो कहां जाएं? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बिरले लोग ही होते हैं जो भयंकर रिस्क उठाना चाहते हैं। अन्यथा ज्यादातर निवेशक या ट्रेडर न्य़ूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न कमाना चाहते हैं। जीवन, स्वास्थ्य या संपत्ति के रिस्क को संभालने के लिए बीमा है। पर, वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने के क्या उपाय हैं? एक आम तरीका तो लोग यह अपनाते हैं कि किसी से टिप्स ले ली जाए। लेकिन टिप्स लेना शत-प्रतिशत घाटे सौदा साबित होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जो पल गुज़र चुका, उसको लेकर बहुत सारी चीजें ऐलानिया कही जा सकती हैं। लेकिन जो पल आनेवाला है, वो अनिश्चितता से घिरा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता। बाकायदा कीमत अदा करके उसे नाथा तो जा सकता है और इसी पर सारा बीमा व्यवसाय टिका है। लेकिन अनहोनी के रिस्क को खत्म नहीं किया जा सकता। शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग के रिस्क को भी कभी खत्म नहीं किया जा सकता। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

डेरिवेटिव सौदे शेयरों की असली चाल की ही छाया हैं। इसलिए उनमें सट्टेबाज़ी का तत्व भी ज्यादा है। हमारी सरकार को यह तत्व घटाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि बढ़ाने की। वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं है। जैसे, आम नियम यह है कि सटोरिया सौदे से हुए नुकसान को सटोरिया सौदे से ही हुए मुनाफे से बराबर किया जा सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार के डेरिवेटिव्स सौदे इस नियम से एकदम मुक्त हैं। अब शुक्र का अभ्सास…औरऔर भी

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जून 2013 में एक विशेषज्ञ दल बनाया था जिसने अपनी रिपोर्ट सितंबर के पहले हफ्ते में ही सरकार को सौंपी है। इसमें उसने कहा कि वित्तीय सेवाओं में ट्रेडिंग के लिए भारत आकर्षक ठिकाना नहीं है। इसलिए यहां शेयरों के डेरिवेटिव सौदों पर लग रहा 0.01% एसटीटी भी खत्म कर देना चाहिए ताकि विदेशी निवेशकों को ज्यादा खींचा जा सके। आप सोचें कि ऐसा करना कहां तक सही होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी