कंपनी के शेयरों की सप्लाई दरअसल, प्रवर्तकों के हिस्से से बचे फ्लोटिंग स्टॉक पर बंधी रहती है। संस्थाएं भी अपने शेयरधारिता हड़बड़ी में नहीं निकालतीं। शेयर की नई मांग तभी बनती है जब उस कंपनी की उपलब्धि व संभावना बढ़ जाती है। फिर खरीद बढ़ने से उसके शेयर उछल जाते हैं। यही बात चार्ट पर दिखती है। चार्ट कंपनी की काया या धंधे की छाया है। इसलिए चार्ट को सर्वोपरि मानना सही नहीं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अक्सर होता यह है कि अच्छे नतीजों के बाद भी कंपनियों के शेयर गिर जाते हैं। कारण, बेहतर नतीजे आने पर पहले से खरीद चुके लोग बेचकर मुनाफा निकालने में जुट जाते हैं। इसलिए नतीजों के आधार पर कोई फैसला करने से पहले चार्ट पर देखना होता है कि कहीं वो स्टॉक ओवरबॉट अवस्था में तो नहीं चला गया है। अच्छे नतीजे तभी असर दिखाते हैं, जब वो ओवरसोल्ड अवस्था में होता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बेहतर नतीजों के असर पर तीन खास कंपनियों का जिक्र करना उपयुक्त होगा जिन्हें हमने चढ़ने से ठीक पहले पकड़ा था। एचडीएफसी 1105 से 1265 तक, हिंडाल्को 94 से 107 और लार्सन एंड टुब्रो 1295 से 1495 तक मार कर चुका है। इन तीनों के नतीजों के समय बाज़ार बंद या ठंडा था। इसलिए सबको सोचने और एंट्री करने का मौका मिल गया। साल में तिमाही नतीजों के चार ऐसे मौके आते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

किसी भी अन्य बाज़ार की तरह वित्तीय बाज़ार में भी भाव मांग और सप्लाई के संतुलन से तय होते हैं। लेकिन वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार में मांग तब पैदा होती है, जब अधिकांश लोगों को लगता है कि सूचकांक या खास शेयरों के भाव बढ़नेवाले हैं। शेयरों के भाव तब बढ़ते हैं जब उन्हें खरीदनेवाले ज्यादा होते हैं और ऐसा तब होता है कि कंपनी के नतीजे उम्मीद से बेहतर होते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में अतीत को समझकर भविष्य को नाथा जाता है। इसके लिए कोई सर्व-स्वीकृत नियम नहीं हैं। चार्ट पर भावों का ट्रेन्ड समझना ज़रूरी है। ओवरबॉट या ओवरसोल्ड, सपोर्ट, रेजिस्टेंस व संस्थाओं की पोजिशन को समझने के लिए बहुत से इंडीकेटरों में से काम के संकेतक चुनने होते हैं। कुछ कहते हैं कि नतीजों के समय ट्रेड नहीं करना चाहिए तो कुछ लोग नतीजों के आसपास ही ट्रेड करते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग में स्व-नियंत्रण के बाद ही बाहर के समीकरण को समझने और मुठ्ठी में करने का काम शुरू होता है। लेकिन इसमें सबसे अहम चीज़ अपने मूल अस्त्र या पूंजी को बचाकर रखना होता है। ट्रेडिंग पूंजी बढ़े नहीं तो उसको ज्यादा आंच भी न आए, यह हमेशा पक्का करना पड़ता है। इसीलिए एक सौदे में 2% और महीने में 6% से ज्यादा नुकसान नुकसान न उठाने का अकाट्य नियम बनाया गया है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग शुरू करते हैं तो हमें इससे मुनाफा कमाना होता है। लेकिन समय बीतने के साथ हम ट्रेडिंग के लिए ट्रेडिंग करने लगते हैं। नशे की तरह इसके एडिक्ट हो जाते हैं। हर दिन ट्रेडिंग करते हैं जैसे कोई दिहाड़ी मजदूर हों। याद रखें, सफल ट्रेडर के लिए हर दिन ट्रेडिंग करना ज़रूरी नहीं। जब मौका अच्छा दिखे, माहौल अपने माकूल हो, तभी ट्रेडिंग करनी चाहिए। नहीं तो अभ्यास करना ही काफी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदे की रणनीति कहने में जितनी आसान है, करने में उतनी ही कठिन। इसमें पहली लड़ाई हमें खुद से ही लड़नी पड़ती है। सालों-साल से जो धारणाएं मन में बैठा रखी हैं, उन्हें तोड़ना पड़ता है। यहां तक कि शरीर में सहजता से सक्रिय हो जानेवाले हार्मोन तक से जूझ़ना पड़ता है। एड्रेनलीन हार्मोन हमारे भीतर करो-मरो का भाव जगाता है। लेकिन इससे बचने से ही ट्रेडिंग सधती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

कोई भी युद्ध अट्ठे-कट्ठे नहीं जीता जाता। इसके लिए सुविचारित रणनीति ज़रूरी होती है। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भी आज के ज़माने का बड़ा सघन युद्ध है। अगर आपके पास ट्रेडिंग की कोई रणनीति नहीं है तो बेहतर होगा कि आप खुद को लंबे समय के निवेश तक सीमित रखें। लेकिन निवेश व ट्रेडिंग के पीछे समान सोच रखें कि हमें न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदा कमाना है। कैसे होगा यह हासिल? अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार सिर्फ खरीद-बिक्री के संतुलन से नहीं, बल्कि मूल आर्थिक स्थिति से भी संचालित होता है। पिछले पांच-छह सालों में क्रूड ऑयल का हाल इसका प्रमाण हैं। जो लोग खाली चार्ट के भरोसे उसकी फ्यूचर ट्रेडिंग कर रहे थे, असली बाज़ार ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा। कंपनियों के शेयरों के भाव भी अंततः उनके बिजनेस की मूल स्थिति से प्रभावित होते हैं। इसलिए ट्रेडिंग के लिए फंडामेंटल भी जानना जरूरी है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी