शेयर बाज़ार के निवेशक आम ग्राहक की तरह है जो काम की चीज़े खरीदकर अपने मूल काम-धंधे में लग जाते हैं और अगली बार ज़रूरत पड़ने पर ही फिर बाज़ार का रुख करते हैं। लेकिन ट्रेडर का तो काम-धंधा ही शेयर बाज़ार से चलता है। उसे नियमित अंतराल पर बाज़ार का चक्कर लगाना पड़ता है। इसलिए उसकी मानसिकता अलग होती है और उससे ज्यादा चौंकन्नापन बरतने की अपेक्षा की जाती है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

प्याज़ सस्ता बिके या महंगा, व्यापारी को फर्क नहीं पड़ता। उसका काम थोक में माल खरीदकर रिटेल में बेचना है। इस तरह ज्यादा नहीं, थोड़े-थोड़े मार्जिन को जोड़कर वो मज़े में कमा लेता है। लेकिन शेयर बाज़ार के ट्रेडर अपनी सीमाएं भूलकर खुद को मालिक या रिटेल ग्राहक बना डालते हैं तो बराबर मुंह की खाते हैं। वे सामान्य व्यापारी हैं, इस हकीकत को याद रखें तो मंदी या तेज़ी में भी कमाएंगे। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

लोकतंत्र में चुनावों का बड़ा महत्व है। लेकिन चुनाव पांच-साला अनुष्ठान हैं तो मतदाता पुरानी बातें भुलाकर नए वादों के जाल में फंस जाता है। सत्तापक्ष को वादे न पूरा करने की भरपूर कीमत ज़रूर चुकानी पड़ती है, लेकिन लोग विपक्ष की कारगुजारियां भूलकर उसके नए वादों के झांसे में पड़ जाते है। मगर, बाज़ार का चक्र हर दिन और सप्ताह का होता है तो यहां झूठ की कलई उतरते देर नहीं लगती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

समाज बुद्धिजीवियों की कितनी भी इज्जत करे। लेकिन समाज व बाज़ार सिद्धांतों या बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, बल्कि व्यवहार से चलता है। कुछ समय के लिए बातें अपना असर दिखा सकती है। लेकिन जैसे ही बातों की हकीकत सामने आती है, बाज़ार उसे ही अपना आधार बना लेता है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से निकलने की बड़ी घटना की असलियत ने बाजार के इस शाश्वत सच को उजागर कर दिया है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

आम ट्रेडर को हर हाल में खबरों के वक्त ट्रेडिंग से बचना चाहिए। लेकिन अगर आप खास हैं और राजनीति से लेकर अर्थनीति तक में इतनी गहरी पैठ रखते है कि बाज़ार की भीड़चाल से अलग हटकर अनुमान लगा सकते हैं तो इनसे जुड़ी खबरों के वक्त ट्रेडिंग से अच्छी कमाई कर सकते हैं। शर्त इतनी है कि राजनीतिक या आर्थिक घटनाक्रम आगे क्या मोड़ लेगा, इसका पूरा भान आपको होना चाहिए। अब करें, शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आम ट्रेडर के पास क्या होता है! अतीत के आंकड़े और टेक्निकल एनालिसिस का ज्ञान। पुराने भावों और पैटर्न के दम पर वो भावी चाल का अंदाज़ा लगाता है। इतिहास खुद को दोहराता है तो यह अंदाज़ा सही पड़ जाता है और वो कमा लेता है। अन्यथा, रिस्क प्रबंधन के सूत्र अपनाकर घाटे को न्यूनतम रखते हुए पूंजी को बचाकर चलता है। लेकिन खबरों के दौरान भविष्य का अंदाज़ लगाना संभव नहीं होता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम हमेशा ट्रेड करना चाहते हैं क्योंकि कोई मौका चूकना नहीं चाहते। लेकिन नहीं समझ पाते कि कुछ मौकों को छोड़ देना लंबी पारी खेलने के लिए बेहद ज़रूरी होता है। हर कोई बाउंसर नहीं खेल पाता। हमें अपनी सीमा और कमज़ोरी का भान हमेशा होना चाहिए। संस्थाएं और बड़े ऑपरेटर दो बजे के आसपास करोड़ों का मार्केट ऑर्डर देकर अगले दिन का रुख तय कर देते हैं। हम नहीं कर सकते। अब चलाएं, बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर हम तभी ट्रेड करते हैं जब हालात अपने माफिक हों तो अपनी सफलता की अधिकतम प्रायिकता को सुनिश्चित करते हैं। जब हमें पता हो कि हमारी रणनीति काम नहीं करने जा रही है, तब ट्रेडिंग से दूर रहकर हम अनावश्यक रिस्क से खुद को बचाते हैं। शेर से लड़ गए और शेर खा गया, जैसी बहादुरी का कोई फायदा नहीं होता। न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदा। यही है सही सोच। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेखचिल्ली लोग न तो समाज में सफल होते हैं, न राजनीति या कूटनीति में सफल होते हैं और न ही वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में। गांठ बांध लें कि अगर जीतना है, कमाई करनी है तो शेयर बाज़ार में तभी ट्रेडिंग करें, जब हालात अपने पक्ष में हों। जाहिर है, आगे क्या होगा, यह हमारे वश में नहीं। लेकिन जब हर तरफ भयंकर अनिश्चितता छाई हो, तब कतई ट्रेड न करें। अब समझते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

खबरों पर शेयर बाज़ार में उथल-पुथल मचती है और ज्यादा बड़ी खबरों पर ज्यादा ही बवाल मचता है। मसलन, 17 मई 2004 को वाजपेयी सरकार की हार पर बाज़ार एक दिन में 11.1% टूट गया था, जबकि 17 मई 2009 को यूपीए सरकार की जीत पर 17.3% चढ़ गया था। इस हफ्ते सोमवार को राजन के झटके पर कुछ ऐसा ही अंदेशा था। अचंभा! कुछ हुआ नहीं। झटका ब्रिटेन की संघ-निकासी पर! करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी