वित्तीय बाज़ार में तीन ट्रेन्ड होते हैं। अप-ट्रेन्ड, डाउन-ट्रेन्ड और साइड-वेज़। सिदधांततः तीनों ही ट्रेन्ड में ट्रेडिंग से कमाया जा सकता है। डाउन-ट्रेन्ड में बाज़ार व शेयरों के गिरने पर शॉर्ट सौदों से कमा सकते हैं। मगर, ये सौदे केवल एफ एंड ओ सेगमेंट में किए जा सकते हैं जिसमें न्यूनतम लॉट 5 लाख रुपए का है। वहीं साइड-वेज़ में सीमित रेंज के कारण ज्यादा फायदा नहीं मिलता। तब अप-ट्रेन्ड ही बचता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेन्ड एक ऐसी चीज़ है जिसे बिना समझे ट्रेडिंग से कमाया नहीं जा सकता है। दो से छह साल (ज्यादा लंबा), छह महीने से दो साल (लंबा), दो महीने से छह महीने (मध्यम) और अभी से दो महीने पहले (अल्पकालिक)। समय के ये चार फ्रेम हैं जिनमें बाज़ार या किसी स्टॉक के ट्रेन्ड को देखा-समझा जाता है। ट्रेन्ड को समझना लगता बड़ा आसान है। लेकिन बड़े-बड़े दिग्गज भी इसमें धोखा खा जाते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

संस्कृत की सदियों पुरानी कहावत है महाजनो येन गतः स पन्थाः। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भी यह सूक्ति चलती है कि ‘ट्रेन्ड इज़ योर फ्रेन्ड’ और हमेशा ट्रेन्ड के साथ ट्रेड करो। लेकिन कभी ध्यान से सोचने की कोशिश कीजिए कि यह ट्रेन्ड आखिर बनता कैसे है? कौन उसकी चाल का आगाज़ करता है? फिर कभी-कभी तो कोई ट्रेन्ड ही नहीं होता और शेयर बाज़ार सीमित रेंज में कदमताल करते रहते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

चक्रवात हो या सुनामी, उसके आगे छोटे-बड़े या अमीर-गरीब, सभी का रिस्क एक जैसा होता है। इसी तरह बाज़ार का रिस्क संस्थाओं से लेकर रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों तक समान रहता है। फर्क बस इतना है कि दोनों इस रिस्क को अलग तरीके से देखते और उससे निपटते हैं। रिटेल ट्रेडर हमेशा टिप्स पकड़ने के लिए हर किसी से पूछता है कि बाज़ार कहां जाएगा, जबकि संस्थाएं बाज़ार का मूड जानने के लिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हर नए ट्रेडर को भावनाओं को साधने के दौर से गुजरना ही पड़ता है क्योंकि इसके बिना ट्रेडिंग में कामयाबी मिल ही नहीं सकती। लेकिन भावनाओं पर नियंत्रण पाने में सालोंसाल लग जाते हैं। फिर भी मन की परम अवस्था हमेशा के लिए स्थाई नहीं रहती। वहां बराबर ‘काम प्रगति पर है’ जैसी स्थिति बनी रहती है। याद रखें कि ट्रेडर पैदाइशी नहीं होते, बल्कि वे यहीं पर सीखकर बनते हैं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दिमाग को जैसा पढ़ा दो, वो तोता-रटंत कर लेता है। लेकिन मन को सिखाने में बड़ी मशक्कत व वक्त लगता है। बचपन व परिवेश से मिली वृत्तियां सहजबोध या कॉमन-सेंस बनकर वहां जमी रहती हैं जो हमारे विचारों से लेकर भावनाओं तक को नियंत्रित करती हैं। फिर उन्हीं के हिसाब से शरीर की तमाम ग्रंथियां हार्मोन्स का स्राव करती हैं और हम कभी उनके विषम दुष्चक्र से निकल ही नहीं पाते। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सफल ट्रेडरों पर गौर करें तो उनमें से कोई भी आपको ट्रेडिंग के नुकसान पर किल्लाता हुआ नहीं मिलेगा। ऐसा नहीं कि वे दुनिया से अपनी भावनाएं छिपा ले जाते हैं, बल्कि ट्रेडिंग में घाटे पर उनकी कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया ही नहीं होती। भावनाओं पर नियंत्रण तो बड़े-बड़े योगी तक नहीं कर पाते। फिर आखिर वे कैसे यह कमाल कर लेते हैं। जवाब है – दिनों या महीनों नहीं, सालोंसाल के अभ्यास से। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर आपको भी घाटे के दलदल में धंसने के दुःस्वप्न आते हैं तो शांत होकर सोचिए कि ट्रेडिंग का बिजनेस आपके लिए है या नहीं। इंसान को ऐसा कोई बिजनेस नहीं करना चाहिए जिसमें तकलीफ उसकी उपलब्धि से ज्यादा हो। तकलीफ इतनी है कि आप चैन से सो भी नहीं पा रहे तो ऐसा बिजनेस भाड़ में जाए। वैसे भी तनाव आपको सफल नहीं होने देगा। तब आपको ट्रेडिंग फौरन छोड़ देनी चाहिए। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बच्चों को सोते वक्त भूतों व राक्षसों के डरावने सपने आते हैं। अगर आपको भी ट्रेडिंग में भयंकर घाटा लगने के दुःस्वप्न आते हैं तो इसका मतलब कि आप अभी तक ट्रेडिंग में एकदम कच्चे और बच्चे हो। याद रखें कि आपको वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में घाटे की नहीं, स्टॉप-लॉस को स्वीकार करने की आदत डालनी है। कोई भी बिजनेस बिना लागत के नहीं चलता। स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग की लागत है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

आजी ने बताया कि तुम्हारे पुरखों ने सोना गाड़ रखा तो वह खोदने लगा। गहरा गढ्ढा खोद डाला, कुछ नहीं मिला। खोदता चला गया। फिर भी कुछ नहीं मिला। अंत में खोदना बंदकर वापस चला गया। उसे अहसास नहीं था कि पांच फुट नीचे ही सोना है। उसका भाई आया। उसने वहां केवल पांच फुट खोदा और सोना मिल गया। ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए ऐसा ही धैर्य, दृढ़ निश्चय और अनुशासन चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी