कैसे पता लगाया जाए कि बड़े संस्थागत निवेशक बाज़ार में कहां खरीद-बेच रहे हैं। बहुतेरे लोग कहेंगे कि यह पता लगाना दूर-दूर संभव नहीं। फिर, बड़े-बड़े नाम लेकर लोग उल्लू ही बनाते हैं। हम कहते हैं कि आपको कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। बीएसई या एनएसई पर स्टॉक का डेली/वीकली चार्ट खोलिए। आखिरी भाव से बाईं तरफ चलते जाइए। जहां से पिछली बार भाव चढ़े या गिरे थे, वहीं रुक जाएं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

संस्थागत निवेशक वहीं खरीद या बिक्री करते हैं, जहां सप्लाई व डिमांड में असंतुलन होता है तो उनकी चाल जानने के लिए हमारा फोकस इस असंतुलन का पता लगाने पर होना चाहिए। इसके लिए किसी उस्ताद या एनालिस्ट की शरण में जाने की ज़रूरत नहीं। इसका रहस्य बाज़ार या स्टॉक के भावों का चार्ट ही खोल देता है। बस उसे कायदे से देखना और भावों के पीछे की भावना को समझना आना चाहिए। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

डिमांड और सप्लाई में क्यों, कैसे हो रहा है, रिटेल ट्रेडर को इसके बजाय सारा ध्यान यह जानने पर लगा देना चाहिए कि सप्लाई और डिमांड की वास्वतिक स्थिति क्या चल रही है। बाकी सारी न्यूज़ और चर्चाएं उसके लिए बकवास हैं। एचएनआई, बैंक, बीमा कंपनियां और अन्य संस्थागत निवेशक क्यों खरीद या बेच रहे हैं, हमें इससे क्या मतलब! हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि वे कहां और क्या खरीद-बेच रहे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

थोक व्यापारी के पास फुरसत होती है और संसाधन भी। वो बारीकी से पता लगा सकता है कि डिमांड और सप्लाई को कौन-सी चीजें प्रभावित कर रही हैं। लेकिन वित्तीय बाज़ार में चक्कर यह है कि छोटे से छोटा ट्रेडर अमेरिकी ब्याज दर, कच्चे तेल के दाम, सीरिया संकट और उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण जैसे मसलों पर बहस करता रहता है। दरअसल, उसे ऐसा करने की फालतू आदत डलवा दी गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

दिग्गज अर्थशास्त्री से लेकर आम इंसान तक जानता है कि भाव डिमांड व सप्लाई से तय होते हैं। सप्लाई बंधी या कम रहे और डिमांड बढ़ जाए तो भाव पक्का चढ़ जाते हैं। जहां सप्लाई और डिमांड का संतुलन टूटता है, भाव वहीं से रुख बदल लेते हैं। यह सर्वमान्य सच है। मतभेद इसको लेकर होता है कि कौन-सी चीजें डिमांड और सप्लाई को प्रभावित कर रही हैं। इसका जवाब बड़ा महत्वपूर्ण है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है। दशहरा बीत गया। दो हफ्ते बाद दिवाली है। लक्ष्मी का त्योहार। व्यापारियों का त्योहार। व्यापारी खुद कुछ बनाते नहीं बल्कि दूसरों के बनाए माल को बेचनेवाले से लेकर खरीदनेवाले तक पहुंचा देते हैं। उनको कोई मतलब नहीं कि टूथपेस्ट बाबा रामदेव बना रहे हैं या कॉलगेट और वो कैसे बनाया जाता है। व्यापारी को इससे मतलब होता है कि उसे किसमें ज्यादा मार्जिन मिल रहा है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हर कंपनी के शेयर का अलग बीटा होता है। बीटा सांख्यिकीय गणनाओं से निकाली गई एक संख्या है जिस तक पहुंचने में स्टैंडर्ड डेविएशन व वेरियंस का इस्तेमाल किया जाता है। बीटा बताता है कि कोई स्टॉक पूरे बाज़ार यानी मुख्य सूचकांक के साथ कितनी लय में चलता है। अगर यह एक है तो बाज़ार के एकदम साथ। इससे कम या ज्यादा होना उसकी सापेक्ष चंचलता को दिखाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एनएसई या बीएसई की वेबसाइट भावों के अलावा तमाम ऐसी सूचनाएं देती हैं जिनसे सच तक पहुंचने में मदद मिलती है। इसी तरह की एक सूचना है वैल्यू ऐट रिस्क या वार। कैश सेगमेंट के हर स्टॉक के बारे में बीएसई व एनएसई सांख्यिकी गणनाओं के आधार पर ‘वार’ से जुड़ी चार दरें देते हैं। इन्हें समझ लिया जाए तो अंदाज़ लग सकता है कि वो शेयर गिरा तो कितना गिर सकता है। अब गुरुवार का दशा-दिशा…औरऔर भी

मंगलवार को दशहरा। बुधवार मोहर्रम। दोनों में छिपा हुआ संदेश है असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की जीत। सत्यमेव जयते। आदर्श बाज़ार में भी अंततः सच ही जीतता है। लेकिन दिमाग पर धारणाओं की पट्टी बंधी हो तो सच सामने होते हुए भी नहीं दिखता। सच कहीं अकेले हीरे या मणि की तरह चमकता हुआ नहीं दिखता। वो सूचनाओं के मंथन, उनके मेल से निकलता है। सच सूचनाओं का सार है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

जीवन में कुछ भी स्थिर और शाश्वत नहीं। चीजें अपने विलोम में बदल जाया करती हैं। उसी तरह शेयर बाज़ार में कोई ट्रेन्ड हमेशा के लिए नहीं होता। बाज़ार चक्रों में चलता है। स्टॉक भी कंपनी के मूलभूत पहलू बदलते ही विपरीत ट्रेन्ड पकड़ लेते हैं। मसलन, चार साल से नई ऊंचाइयां पकड़ता रहा जुबिलैंट फूड्स एक साल से गिरता जा रहा है तो उसके मोह से मुक्त हो जाना चाहिए। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी