ईरान पर अमेरिका व इज़राइल के हमले ने न केवल वहां के सत्ता शीर्ष को खत्म कर दिया है, बल्कि सारी दुनिया में भूचाल ला दिया है। पूरा मध्य-पूर्व सुलझ रहा है। ट्रम्प ईरान के अवाम को सत्ता कब्ज़ा करने के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन ईरान सरकार में नेतृत्व की दूसरी रैंक ने मोर्चा संभाल लिया है। उसके लिए यह राजनीति ही नहीं, विचारधारा की लड़ाई है। ईरान पर हमले का रूस और चीन, दोनों नेऔरऔर भी

देश में सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का अटका भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों से दिलवाने के लिए जनवरी 2017 से लागू ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) की व्यवस्था अपनी सामर्थ्य दिखा चुकी है। लागू होने पहले साल वित्त वर्ष 2017-18 में इस प्लेटफॉर्म से छोटे उद्यमों को ₹950 करोड़ ही मिल सके। लेकिन वित्त वर्ष 2021-22 में यह रकम ₹40,000 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 मे ₹2.33 लाख करोड़ तक जा पहुंची।औरऔर भी

भारत के आर्थिक इतिहास का दुखद सच है कि यहां छोटे उद्योग व व्यापार की कभी कद्र नहीं हुई। सरकारी और निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों पर ही सरकार की कृपा बरसती रही। औद्योगिक नीति में पीएलआई जैसी सब्सिडी बड़ी कंपनियों को मिलती रही। इन्हीं नीतियों का नतीजा है कि अक्सर छोटी कंपनियां बाल्यावस्था से प्रौढ़ बनते हुए बड़ी नहीं बनतीं, बल्कि बौनी ही रह जाती हैं। उम्मीद थी कि यह सच्चाई बदल जाएगी। खासकर जनवरी 2017औरऔर भी

छोटे उद्योग-धंधों के भुगतान की समस्या हल करने के लिए ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) जनवरी 2017 से लागू कर दिया गया। फिर भी यह समस्या उस गति से नहीं सुलझी, जिस गति से सुलझनी चाहिए थी। 2021 के अंत तक इन एमएसएमई इकाइयों का ₹10.7 लाख करोड़ का भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों के पास अटका पडा था। मार्च 2024 तक भी यह रकम घटकर ₹7.34 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। यह रकमऔरऔर भी

बड़ी सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा एमएसएमई इकाइयों का भुगतान लटकाने की समस्या सुलझाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2011 में फैक्टरिंग रेग्युलेशन एक्ट बनाया था। यह सही दिशा में उठा कदम था और इसने एमएसएमई की फाइनेंसिंग व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क बना दिया। फिर भी समस्या सुलझी नहीं। साल 2014 में रिजर्व बैंक ने इस बाबत एक कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया, जिसके आधार पर आज का ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टमऔरऔर भी

एमएसएमई क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, चाहे वो निर्यात हो या रोज़गार सृजन। लेकिन देश के सत्ताशीर्ष पर बारह सालों से बैठा शक्स इस रीढ़ को ही तोड़ने में लगा है। यह कितना बड़ा छलिया है कि सत्ता संभालने के पहले दिन से खुद को इस क्षेत्र को रहनुमा बताता रहा है। इसके झूठ को मीडिया का भोंपू इतना बढ़ा देता है कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम हर कोने से त्राहिमाम करते इस क्षेत्र की पुकार किसी कोऔरऔर भी

देश के जीडीपी में 30.1% योगदान वाले एमएसएमई क्षेत्र की हालत साल-दर-साल खराब होती जा रही है। लेकिन सरकार का जुबानी जमाखर्च बदस्तूर जारी है। इस बार बजट के पहले कर्तव्य में चैम्पियन एमएसएमई बनाने का वादा है। इससे पहले 2025-26 के बजट में कृषि के बाद इसे विकास का दूसरा इंजिन बताया गया। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि 2024-25 में इसका बजट आवंटन ₹22,137.95 करोड़ था, संशोधित अनुमान ₹17,306.70 करोड़ का था और वास्तविक खर्चऔरऔर भी

ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिशराज में भारत से कच्चा माल लूटकर बाहर ले जाया गया और अंतिम उत्पाद बनाकर दुनिया भर के बाज़ारों में बेचा गया। इसमें सुगमता के लिए उन्होंने भारत में बंदरगाह व सड़कें बनाई और रेल नेटवर्क तैयार किया। उनकी इस अनीति से भारत के लाखों छोटे उद्योग-धंधे और कारीगर तबाह हो गए। मोदी सरकार भी कमोबेश यही कर रही है। अंतर बस इतना है कि वो विदेशी कंपनियों को भारत में कच्चा मालऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया भर के डेटा को भारत आने का न्यौता दे दिया। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट मे विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर बनाने पर अगले बीस साल तक टैक्स से मुक्ति दे दी। अब अमेरिकी कंपनी एएमडी ने भारत में 200 मेगावॉट क्षमता का एआई डेटा सेंटर बनाने का इरादा घोषित कर दिया। इसमें उसने टीसीएस को जूनियर पार्टनर बनाया है। इस तरह मोदी प्रसन्न और सीतारमण का रमण-चक्र पूरा। लेकिनऔरऔर भी

मेक इन इंडिया का कार्यक्रम चलाया तो विदेशी कंपनियों से खुलकर कहा कि भारत में आकर बनाओ और दुनिया भर में बेचो। लेकिन 11 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद स्थिति यह है कि देश में जितना विदेशी पूंजी निवेश आ रहा है, उससे ज्यादा स्वदेशी निवेश बाहर जा रहा है। स्वदेशी मैन्यूफैक्चरिंग का भट्ठा बैठ गया, जबकि उद्योग-धंधों में चीनी घुसपैठ बढ़ गई। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में एआई का विशाल वैश्विक सम्मेलन करऔरऔर भी