प्रगति कभी हवा में नहीं होती। विकास हमेशा निरंतरता में होता है। यह कहना सफेद झूठ, सरासर धोखा और फरेब है कि मई 2014 से पहले देश में कुछ हुआ ही नहीं और सब कुछ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हुआ। जिन जनधन खातों, आधार और मोबाइल (जेएएम या जैम) को मोदी सरकार अपनी सफलता का मूलाधार बताती है, इन सभी की नींव मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के शासन में रखीऔरऔर भी

मोदी सरकार की श्रेय लेने की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है बैंकों के जनधन खाते। 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जनधन योजना इस अंदाज़ में लॉन्च की गई, जैसे पहले कुछ था ही नहीं। हद तो तब हो गई, जब दो महीने पहले ही केंद्र में विदेशी मामलों से लेकर संस्कृति तक की राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने 28 दिसबर 2023 को बयान दिया कि कांग्रेस के राज में आजादी से लेकर मई 2014 तक देश मेंऔरऔर भी

श्रेय लेने की राजनीति की भी कोई हद होती है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के बजट में शतरंज के चैम्पियन बढ़ने का भी श्रेय ले लिया। उन्होंने कहा था कि भारत में साल 2010 में 20 से कम ग्रैंडमास्टर थे, जबकि आज 80 से ज्यादा ग्रैंडमास्टर है। उनके आका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो श्रेय लेने की राजनीति में उस्तादों के भी उस्ताद निकले। मोदी सरकार की गारंटी वाले एक विज्ञापन में दावा किया गयाऔरऔर भी

पहली बार अच्छे दिन और विदेश से कालाधन वापस लाने का जुमला था। मतदाता ने भरोसा किया। दूसरी बार पुलवामा के शहीदों के नाम पर अवाम की देशभक्ति को ललकारा गया। तब भी मतदाता ने तहेदिल से साथ दिया। लेकिन न अच्छे दिन आए, न विदेश से कालाधन और न ही देश की बाहरी-भीतरी सुरक्षा मजबूत हुई। हां, इतना ज़रूर हुआ कि विरोधियों पर ईडी व सीबीआई के हमले तेज कर दिए गए। विपक्ष के जो नेताऔरऔर भी

इसे राजनीतिक अवसरवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले चुनावी सभाओं व रैलियों में खुद को अति पिछड़ा बताते थे, वे अब कहने लगे हैं कि भारत में केवल चार ही जातियां हैं – गरीब, युवा, महिलाएं और किसान। उनमें यह बदलाव तब आया, जब विपक्ष के इंडिया गठबंधन ने जाति जनगणना का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा दिया। प्रधानमंत्री पिछड़ी व दलित जातियों की गोलबंदी को रोकने के लिए नईऔरऔर भी

दस साल हो गए। क्या अच्छे दिन सभी के आ गए? किसानों की आय 2022 में दोगुनी होनी थी। हो गई क्या? हर साल दो करोड़ नौजवानों को रोज़गार मिलना था। मिला क्या? पांच ट्रिलियन डॉलर या पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था मार्च 2025 तक बन जानी थी। बन पाएगी क्या? खुद सरकार मानती है कि हमारा जीडीपी ऊपर-ऊपर 10.5% बढ़ जाए, तब भी मार्च 2025 तक हमारी अर्थव्यवस्था 3,27,71,808 करोड़ रुपए यानी 3.95 ट्रिलियन डॉलरऔरऔर भी

मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के पहले कार्यकाल के पहले साल वित्त वर्ष 2014-15 में फर्टिलाइज़र सब्सिडी पर ₹70,967.31 करोड़ खर्च किए थे। अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल वित्त वर्ष 2019-20 में इस मद पर उसने वास्तव में ₹81,124 करोड़ खर्च किए। पर अगले वित्त वर्ष 2020-21 उसने फर्टिलाइज़र सब्सिडी का बजट आवंटन घटाकर ₹71,309 करोड़ कर दिया। तभी मार्च 2020 में कोरोना की महामारी आ गई तो पूरे वित्त वर्ष 2020-21 में उसे बजट अनुमानऔरऔर भी

लोकसभा चुनाव में अभी तीन महीने बचे हैं। लेकिन महीने भर पहले 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही मोदी सरकार का प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। इन दिनों अखबारों के पहले पेज़ पर सबसे ऊपर पूरे आठ कॉलम में ‘मोदी सरकार की गारंटी’ छापी जा रही है। एकदम एकतरफा। कहीं इसकी कोई काट नहीं। लेकिन खुद मोदी सरकार के अपने ही आंकड़े इस गांरटी के झूठ का पर्दाफाश करने के लिएऔरऔर भी

ताज़ा खबर यह है कि चीन भारत की सीमा पर पिछले पांच सालों से जो 628 गांव बना रहा था, उनमें उसने अपने लोगों को बसाना शुरू कर दिया। इससे पहले वो जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हमारी लगभग 800 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है। लेकिन एक सच्चाई जो कभी खबर नहीं बनी, वो यह है कि आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक-इन इंडिया’ के नारों के बीच औद्योगिक इनपुट के लिए चीनऔरऔर भी

देश में आर्थिक विकास की उलटबांसी चल रही है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में हमारी 44.1% श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था और मैन्यूफैक्चरिंग में 12.1% को। वित्त वर्ष 2021-22 तक विकास की ऐसी कर्मनाशा बही कि कृषि में लगी श्रमशक्ति बढ़कर 45.5% और मैन्यूफैक्चरिंग में घटकर 11.6% हो गई। श्रमशक्ति से बाहर निकलकर देखें तो देश की 60-70% आबादी अब भी किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भरऔरऔर भी