हद भविष्यवाणी की
हम वर्तमान की जमीन पर खड़े होकर, उसी के फ्रेम में रहकर भविष्य का अनुमान लगाते हैं। भविष्य में यह फ्रेम खुद कैसे बदल जाएगा, इसका पता नहीं रहता। इसीलिए बड़े-बड़े विशेषज्ञों तक की भविष्यवाणियां बाद में हास्यास्पद साबित हो जाती हैं।और भीऔर भी
रिश्तों का ग्लिच
टेक्नोलॉजी रिश्तों को घर-परिवार की सीमा से निकालकर अनंत वर्चुअल विस्तार दे देती है। लेकिन उसका हल्का-सा ग्लिच भी इन रिश्तों को खटाक से तोड़ देता है। फिर बच जाती है एक कचोट और यह अहसास कि हम कितने असहाय हो गए हैं।और भीऔर भी
रैखिक बनाम गोलाकार
इंसान की नज़र की सीमा है कि वह रैखिक ही देख सकता है। इसलिए रैखिक ही सोचना सहज है। लेकिन हकीकत यह है कि इस दुनिया में ही नहीं, पूरी सृष्टि में हर चीज का आकार आखिरकार गोल है। इसलिए सहज सोच अक्सर कारगर नहीं साबित होती।और भीऔर भी
तर्क का पटरा
तर्क की हद तक वहीं खत्म हो जाती है, जहां तक चीजें रैखिक होती हैं। धरती को जब तक चिपटा माना जाता रहा, तब तक तर्क ही सर्वोपरि थे। लेकिन धरती के गोल होते ही तर्क का सारा पटरा हो गया।और भीऔर भी






