मंजिल और मौका
2011-07-03
कोई कितना ही रोके, चलनेवाले तो अपनी मंजिल और मौका तलाश ही लेते हैं। पानी अपनी डगर बना ही लेता है। हमारा काम बस इतना है कि समाज में जंगल की निरंकुशता न पले, अराजकता न चले।और भीऔर भी
कोई कितना ही रोके, चलनेवाले तो अपनी मंजिल और मौका तलाश ही लेते हैं। पानी अपनी डगर बना ही लेता है। हमारा काम बस इतना है कि समाज में जंगल की निरंकुशता न पले, अराजकता न चले।और भीऔर भी
ये वर्ग और वर्ग संघर्ष संक्रमण काल की चीजें हैं। शांति काल आते ही व्यक्ति ही अंतिम सत्य बन जाता है और सामाजिक व्यवस्था एक-दूसरे को निचोड़ने-खसोटने का जंगल राज बन जाती है।और भीऔर भी
© 2010-2025 Arthkaam ... {Disclaimer} ... क्योंकि जानकारी ही पैसा है! ... Spreading Financial Freedom