विदेश मंत्री एस. जयशंकर मॉस्को तक में रोना रो रहे हैं कि चीन रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और भारत काफी कम। फिर भी भारत पर 25% टैरिफ के ऊपर 25% पेनाल्टी क्यों? इसका जवाब अमेरिका के दो शीर्ष पदाधिकारी पहले ही दे चुके हैं, जिसे जयशंकर सुनना नहीं चाहते। वहां के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेस्सेंट का जवाब है कि चीन य़ूक्रेन युद्ध के पहले रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा है। पहलेऔरऔर भी

मार्च 2020 में जब चीन से कोरोना फटकर सारी दुनिया में फैला तो कहा गया कि यह आपदा भारत के लिए शानदार अवसर है। दुनिया ‘चाइना प्लस वन’ नीति अपनाएगी और इसका भरपूर फायदा भारत को मिलेगा। लेकिन पांच साल बाद पता चला कि सारा फायदा बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया व मलयेशिया जैसे देश ले गए। ऊपर से चीन भारत में घुसता चला गया और हमारी सारी मैन्यूफैक्चरिंग चीन पर निर्भर हो गई। आज उस प्रसंग को भुलाकरऔरऔर भी

कभी बोला कि सौ दिन में विदेश में जमा कालाधन वापस ले आऊंगा। कभी कहा कि 50 दिन दे दो, भ्रष्टाचार खत्म कर दूंगा, आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दूंगा। इसी बीच 2047 तक विकसित भारत की दूर की कौड़ी उछाली गई। पहले हर साल दो करोड़ रोज़गार, अब दो साल में 3.5 करोड़ रोज़गार। बड़ी-बड़ी बातें, मगर नतीजा शून्य। देश में रोज़गार पैदा करना बड़ी चुनौती है। अगर बढ़ती आबादी को सोखना है तो साल 2030 तकऔरऔर भी

मुफ्त राशन देकर 81.35 करोड़ गरीबों को मुरीद बना लो। प्रोत्साहन स्कीम में सब्सिडी देकर मैन्यूफैक्चरिंग बढ़ाने का दावा और अब प्रोत्साहन से ही प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना में 3.5 करोड़ से ज्यादा नई नौकरियों का सृजन। बाज़ार शक्तियों की परवाह नहीं। सरकार को लगता है कि वो ही सर्वशक्तिमान है। उसे दिखता नहीं कि उसकी इन नीतियों के चलते देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 17.9% से घटते-घटते 2024-25 में 12.6% पर आ गया,औरऔर भी

रॉबर्ट लाइटहाइज़र डोनाल्ड ट्रम्प की पिछली सरकार में 2017 से 2021 तक अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रहे हैं। उन्होंने 2023 में प्रकाशित अपनी किताब ‘नो ट्रेड इज़ फ्री’ में लिखा है, “जब भी मैं भारतीय अधिकारियों से वार्ता करता था तो देश के करीब 15 खरबपतियों में हर किसी की जीवनी अपनी डेस्क पर रखता था। भारत सरकार की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए मैं इन्हीं लोगों के हितों पर गौर करता था।” लाइटहाइज़र इस समयऔरऔर भी

रहिमन विपदा हू भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत में जान परत सब कोय। साढ़े तीन महीने पहले 2 अप्रैल को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जवाबी टैरिफ का जो हमला बोला, उसके बाद से साफ हो गया कि मोदी सरकार बाहर राष्ट्रीय हितों की कैसी हिफाजत करती है और भीतर किनके हितों के लिए कांम कर रही है। चीन जैसा अमेरिका का पक्का प्रतिस्पर्धी झुकने के लिए बजाय लड़ता रहा तो वो अपनेऔरऔर भी

मोहभंग तो आजादी मिलने के साल भर बाद ही शुरू हो गया था, जब 1948 में अली सरदार जाफरी ने लिखा था कि कौन आज़ाद हुआ, किसके माथे से स्याही छूटी, मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का, मादरे हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही। लेकिन वो मोहभंग आज़ादी के 78 साल बाद करोड़ों भारतवासियों के दिलों का नासूर बन गया है। सोचिए, इस माटी में जन्मे और आबोहवा में पले-पढ़े 17,10,890 लोग 2014 सेऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रम्प के टैरिफ पर कहते हैं, “हमारे लिए अपने किसानों का हित सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरे भाई-बहनों के हितों के साथ कभी भी समझौता नहीं करेगा। मैं जानता हूं कि व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं।” बहुत बड़ी व्यक्तिगत कीमत यह हो सकती है कि देश के अवाम के साथ 11 सालों से छल किए जाने के कारण उन्हें सत्ताऔरऔर भी

देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित यकीनन सर्वोपरि है। लेकिन लोकतंत्र में जनता ही संप्रभु है और उसका हित ही राष्ट्रीय हित है। राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देनेवाले इस दौर मे समझना ज़रूरी है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय हित का नाम लेकर किसका हित साध रही है। सब जानते हैं कि अपने परम मित्र अडाणी को अमेरिका में रिश्वतखोरी के मामले में जेल जाने से बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ खुलकर नहींऔरऔर भी

आज़ादी के 78 साल बाद भारत की यह कैसी हालत और दुर्भाग्य है कि अमेरिका का सनकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तय रहा है कि हम पेट्रोलियम तेल और हथियार रूस से नहीं, उससे खरीदें। नहीं तो वो हमारे निर्यात पर दुनिया का सबसे ज्यादा 50% टैरिफ लगा देगा। वो भी तब, जब हमारे पास इतनी अपार प्राकृतिक और मानव सम्पदा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे पास, दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार हमारे पास। फिरऔरऔर भी