इंट्रा-डे ट्रेडिंग में सौदे उसी दिन कट जाते हैं और हम अगली सुबह तक की अनिश्चितता से बच जाते हैं। स्विंग ट्रेड में भी यह सुकून पाना संभव है बशर्ते सही योजना बनाकर उसका अनुशासनबद्ध पालन किया जाए। सोचिए कि जो हमारे वश में नहीं है, उसकी चिंता निरर्थक है और जितना वश में है, उसे योजना से बांधा जा सकता है। भाव उलट-पुलटकर तभी देखें जब आपको सौदा करना या काटना हो। अब मंगलवार का दशा-दिशा…औरऔर भी

भावों का इतिहास और ठीक पिछले पल तक के भाव अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं। उनके पीछे होती हैं हज़ारों उम्मीदें, मंसूबे, आशाएं व आशंकाएं। कुछ तार्किक तो बहुत सारी अतार्किक। इन सबके पीछे कमाने का हिसाब-किताब लगाते इंसान। जिन दिन चार्ट पर बनी आकृतियों के पीछे के इंसानों को हम सही-सही देखने में सफल हो जाते हैं, उस दिन से कामयाबी पर हमारी पकड़ कसने लगती है। अब नए हफ्ते का नया अभ्यास…औरऔर भी

हम अपने मुनाफे को अधिकतम संभव स्तर तक दौड़ाकर ले जाना चाहते हैं। लेकिन वो अधिकतम स्तर पहुंचा है या नहीं, इसका फैसला कैसे करें? छह-सात महीने पहले कहते थे कि जुलाई तक निफ्टी 7000 तक जाएगा। लेकिन वो तो कब का 7800 से ऊपर जाकर 7600 के आसपास डोल रहा है। भाव कल की सोचकर चलते हैं, लेकिन कल असल में क्या होगा, कोई नहीं जानता। कुछ संकेतक इशारा ज़रूर करते हैं। अब शुक्रवार की दशा…औरऔर भी

घरेलू अर्थव्यवस्था से अच्छी खबरें आ रही हैं। पहले थोक और रिटेल मुद्रास्फीति जून में घट गई। अब देश का निर्यात जून में 10.22% बढ़ गया। इससे पहले अप्रैल में निर्यात 5.26% और मई में 12.4% बढ़ा था। लेकिन बाहर की खराब खबर यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की प्रमुख ने कहा है कि रोज़गार की स्थिति सुधरती रही तो वहां ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इससे एफआईआई वापस जा सकते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

लोग शेयर बाज़ार को भयंकर ललचाई नज़र से देखते हैं। खासकर तेज़ी के मौजूदा माहौल में वे गारंटी चाहते कि कोई शेयर कितना बढ़ेगा। बड़े मासूम हैं वो कि नहीं समझते कि बाज़ार में पक्की गारंटी जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यहां रिस्क है जिसे सफलतम ट्रेडर को संभालना पड़ता है। पहले स्टॉप-लॉस से लोग इसे संभालते थे। अब रिस्क मैनेजमेंट के दूसरे तरीके भी आ गए हैं। घटी मुद्रास्फीति ने बाज़ार को संभाला है। अब आगे…औरऔर भी

राकेश झुनझुनवाला ने कुछ हफ्ते पहले बोला कि भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी का ऐसा लंबा दौर आ रहा है जैसा अमेरिका में 1982 से 2000 तक चला था। लेकिन तब अमेरिका में बिजनेस का बेहद माकूल माहौल था। वहीं भारत अभी बिजनेस करने की आसानी में दुनिया के 189 देशों में 134वें, बिजनेस शुरू करने में 179वें और कांट्रैक्ट लागू करने में 186वें नंबर पर है। बिजनेस नहीं तो बाज़ार कैसे बढ़ेगा? अब मंगलवार की धार…औरऔर भी

ट्रेंड के साथ चलो। बाज़ार बढ़ रहा है तो खरीदो, गिर रहा है तो शॉर्ट करो। ऐसे घनेरों सूत्र और आइडिया हैं ट्रेडिंग के। लेकिन कामयाबी का सूत्र छिपा है उनके अमल में। मसलन, ट्रेंड के सूत्र की सबसे शुरुआती बात है कि आप उसे नापेंगे कैसे? कौन-सा मूविंग औसत निकालेंगे, सिम्पल या एक्पोनेंशियल और उनका टाइमफ्रेम क्या होगा? फिर जहां से बाज़ार मुड़नेवाला है, उसे कैसे पकड़ेगे? कुछ ऐसे ही हालात में आगाज़ नए हफ्ते का…औरऔर भी

कालिदास के झापड़ मारने के लिए उठे पंजे को पंच महाभूत और घूसे को एकल ब्रह्म बताने जैसी विद्वानों की व्याख्याओं को छोड़ दिया जाए तो मोदी सरकार के पहले बजट में ऐसा कुछ नहीं जिसकी उम्मीद बाज़ार महीनों से संजोए हुए था। उम्मीद से नाउम्मीदी के बीच निफ्टी 3.32% या 252 अंक ऊपर-नीचे हुआ। कुछ तो होगा, की उम्मीद में दो बजे के आसपास उठने की कोशिश की। पर अंततः लुढ़क गया। शुक्र को क्या होगा…औरऔर भी

बजट का दिन। आसमान चढ़ी उम्मीदों की परीक्षा का दिन। हो सकता है कि आज बाज़ार 4-5% ऊपर-नीचे हो जाए। अगले दो दिन भी ज्वार-भांटा चल सकता है। लालच खींचता है कि इस उतार-चढ़ाव पर दांव लगाकर डेरिवेटिव्स से एक दिन में 100% तक बनाए जा सकते हैं। लेकिन संभल नहीं पाए तो पूरी पूंजी स्वाहा! ट्रेडिंग का पहला नियम है कि रिस्क को न्यूनतम करो और पूंजी को संभालो। अब करें, अभ्यास बजट के दिन का…औरऔर भी

शेयर बाज़ार भले ही लंबे समय में कंपनियों के फंडामेंटल और निवेशकों के रवैये से चलता हो। लेकिन छोटे समय में वो ट्रेडरों के रुख और मानसिकता से चलता है। जिन लोगों ने पिछले तीन महीनों में बाज़ार को करीब 16.5% चढ़ाया था, उनके सब्र का बांध अब टूटने लगा है और वे मुनाफावसूली करने लगे हैं। इनमें से बहुतेरे ट्रेडर तो प्रति माह 1.5-2% ब्याज पर धन उठाकर लगाते हैं। मुनाफावसूली के माहौल में अगली रणनीति…औरऔर भी