प्रायिकता के बाज़ार में सोच अतिवादी
हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
