दुनिया के सबसे बुरे निवेशकों में बड़े-बड़े विद्वान, अर्थशास्त्री व वैज्ञानिक तक शामिल है। आइजैक न्यूटन का धन जब ब्रिटेन की साउथ सी कंपनी में साल 1720 में डूब गया तो उनका कहना था – मैं नक्षत्रों की गति की गणना कर सकता हूं, लेकिन इंसानों के पागलपन की नहीं। शेयर बाज़ार में अपना और दूसरों का धन डुबाने वालों में नोबेल विजेता माइरॉन शोल्स व रॉबर्ट मेर्टन भी शामिल हैं। अब परखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

जबरदस्त हल्ला था कि अमेरिका के ब्याज दर बढ़ाते ही आसमान टूट पड़ेगा। लेकिन यहां तो अमेरिका ही नहीं, यूरोप व एशिया तक के बाज़ार चहक रहे हैं। सबक यह कि जहां हर हरकत पर नोट बनाए जाते हैं वहां हर खबर और उससे उपजे डर/उल्लास के पीछे निहित स्वार्थ होता है। वित्तीय बाज़ार में निरपेक्ष सत्य जैसा कुछ नहीं होता। इसलिए हमें हर शोर में छिपी हकीकत को समझना होगा। इसीलिए करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

फेडरल रिजर्व ने जून 2006 के बाद आखिरकार पहली बार ब्याज दरें बढ़ा दीं। ब्याज की रेंज 0.25-0.50% रखी गई है। इसी के साथ सारी दुनिया में महीनों से मची उहापोह का पटाक्षेप हो गया। फेड की अगली जिम्मेदारी सिस्टम में आई नोटों की बाढ़ को संभालना होगा। फेडरल रिजर्व के पास इस समय 4.5 लाख करोड़ डॉलर के बांड हैं, जबकि अमेरिकी बैंकों के पास 2.6 लाख करोड़ डॉलर के रिजर्व हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अमेरिका में फेडरल ओपन मार्केट कमिटी की दो दिन की बैठक भारतीय समय के हिसाब से कल रात शुरू हो चुकी है और कल ब्राह्म मुहूर्त में पौने चार बजे फेडरल रिजर्व की चेयरमैन जैनेट येलेन प्रेस कॉन्फ्रेंस में फैसले का ऐलान करेंगी। इसकी धमक अमेरिकी बाज़ार पर तो फौरन दिखाई देगी, जबकि भारत समेत एशिया के अन्य देशों पर इसका असर कल गुरुवार को पड़ेगा। इसलिए आज सांस रोकने का समय है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हल्ला ऐसा उठा है मानो अमेरिका में ब्याज दर बढ़ते ही सारा कुछ बरबाद हो जाएगा। लेकिन इसके कई फायदे भी हैं। इससे अमेरिका के जो बुजुर्ग अपनी बचत पर मिली ब्याज पर निर्भर हैं, उनकी आय बढ़ जाएगी। इसके बाद अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़कर 2% हो सकती है जिससे डॉलर की विनिमय दर बढ़ेगी और वहां आयातित चीजों के दाम घट जाएंगे। इससे शेयर बाज़ार का बुलबुला भी संभलने लगेगा। अब परखते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यह हफ्ता भारत ही नहीं, दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों के लिए ऐतिहासिक होने जा रहा है। भारत में बुध-गुरु की रात और अमेरिका में बुधवार का दिन वो खबर लेकर आएगा जिस पर सारी दुनिया की निगाहें टिकी हुई है। 70-75% प्रायिकता इस बात की है कि उस दिन फेडरल रिजर्व लगभग एक दशक से ठहरी ब्याज दरों को बढ़ा देगा और यह दर 0.25% से बढ़ाकर 0.50% की जा सकती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बिना लागत के कोई बिजनेस नहीं होता। ऐसे में ट्रेडिंग भी अगर बिजनेस है तो उसकी लागत क्या है? आपकी मेहनत, ब्रोकर की ब्रोकरेज, टैक्स और आपकी ट्रेडिंग पूंजी पर आमतौर पर मिल सकनेवाला ब्याज़। काश! अगर वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग की इतनी ही लागत होती तो वो बहुत मुनाफे का धंधा होता। लेकिन हकीकत में इसमें जो स्टॉप लॉस लगता है, वो इस धंधे की असली लागत है। इससे बचना संभव नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

कभी भी किसी के कहने में न आएं। ब्रोकरों व टेलिविज़न चैनलों पर आनेवाले एनालिस्टों पर कतई भरोसा न करें। वे सब अपना-अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे हैं। हो सकता है कि यदाकदा उनकी किसी बात से आपका फायदा हो जाए। लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं। आपका भला करना उनके बिजनेस मॉडल का हिस्सा नहीं है। न्यूज़ हो तो किनारे हो लें। भावों का चार्ट ही आपका इकलौता भरोसेमंद सहारा है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

इधर टिप्स देनेवालों के साथ ही धंधेबाज़ों की एक नई जमात पैदा हो गई है जो आपको ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ दिलाने का दावा करते हैं। क्लासेज़ चलाते हैं। 25-30 हज़ार से लेकर लाख-डेढ़ लाख तक फीस लेते हैं। ये चार्ट, वो चार्ट। तरह-तरह की एनालिसिस। बाबाओं के अंदाज़ में चमत्कार और गुरु-चेले की फांस। लेकिन उनकी बातों का सार बस इतना है कि ट्रेडिंग भी थोक में खरीदकर रिटेल में बेचने का व्यापार है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

भीड़भाड़ वाली सड़क पर अगर पांच सौ का नोट गिरा पड़ा हो तो सावधान हो जाइए क्योंकि हो सकता है कि कुछ लोग आपको छकाने की मस्ती कर रहे हों। इसी तरह ट्रेडिंग में आसानी से नोट नहीं बनते। देशी-विदेशी दिग्गज यहां मैदान में डटे हैं। उनके बीच उतरकर नोट कमाना शेर के जबड़े से शिकार खींचने जैसी बहादुरी है। लेकिन ट्रेडिंग में बहादुरी नहीं, समझदारी चलती है जो अभ्यास से आती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी