देश ने आज़ादी के फौरन बाद रेअर अर्थ खनिजों या तत्वों का महत्व समझ लिया था। नेहरू के दौर में ही 18 अगस्त 1950 को बाकायदा इंडियन रेअर अर्थ्स लिमिटेड बना ली गई। इसकी रेअर अर्थ डिवीज़न ने केरल के अलूवा में काम करना शुरू कर दिया। फिर साल 1963 में इसे भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत काम करनेवाली सरकारी कंपनी बना दिया गया। इसी के साथ उसने केरल और तमिलनाडु की कुछ जगहोंऔरऔर भी

आज के दौर में 17 रेअर अर्थ खनिज मजबूत व समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला बन गए हैं। ये खनिज दरअसल धरती के भीतर पाए जानेवाले ऐसे तत्व हैं जो हरित ऊर्जा तक पहुंचने से लेकर देश के डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर व सोलर पैनल जैसे उद्योगों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। लेकिन खुद को राष्ट्रवादी बतानेवाली मोदी सरकार ने अपने 12 सालों के शासन में इन दुर्लभ तत्वों की प्राप्ति के लिए कुछ भी सार्थकऔरऔर भी

राष्ट्रवादी सरकार वही है तो देश के प्राकृतिक व मानव संसाधनों का अधिकतम न हो सके तो अभीष्टतम विकास करे। मैक्सिमम नहीं तो ऑप्टिमम। यही देश को आत्मनिर्भर बनाने का भी असली सूत्र है। बाकी सब फालतू बातें और खोखले नारे हैं। मोदी सरकार के राष्ट्रवादी होने के दावे को इसी आधार पर परखा जाना चाहिए। मानव संसाधनों पर यह सरकार 12 सालों में पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुकी है। अभी प्राकृतिक संसाधनों पर उसको परखा जानाऔरऔर भी

मध्य-पूर्व में युद्ध का कोहराम। शेयर बाज़ार में अफरातफरी का आलम। हर दिन और हफ्ते निवेशकों की भीड़ हांकनेवाले दिग्गज कह रहे हैं कि यह मंदी का बाज़ार है और सब कुछ बेच-बांचकर निकल लो। लम्बे निवेश की सोच व दृष्टि रखनेवाले निवेशकों को इस भेड़चाल से मुक्ति पानी होगी। यह सच है कि अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध की क्रिया-प्रतिक्रिया में कच्चे तेल के दाम करीब 25% बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचऔरऔर भी

जिस अर्थव्यवस्था के आकार को लेकर सरकार पिछले कई साल से डींग मार रही थी कि हम दुनिया की पांचवीं के बाद चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं और जल्दी ही तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, उसका आकार 2022-23 को आधार वर्ष बनाते ही घट गया है। पुरानी सीरीज़ में 2022-23 में अर्थव्यवस्था का आकार या नॉमिनल जीडीपी ₹268,90,473 करोड़ था, जो नई सीरीज़ में इससे 2.9% कम ₹261,17,627 करोड़ निकला है। इसी तरह 2023-24 में नॉमिनलऔरऔर भी

मोदी सरकार की विशेषता यह है कि उसने अर्थव्यवस्था के हिसाब-किताब में सतही को असली और असली को नकली बना दिया है। पहले हम नॉमिनल जीडीपी के बजाय रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर को देखते थे। लेकिन रीयल विकास दर अब इतनी नकली हो गई है कि असली तस्वीर जानने के लिए नॉमिनल या सतह पर तैरती विकास दर को देखना पड़ता है। लेकिन यह करतब भी काम नहीं कर रहा। चालू वित्त वर्ष 2025-26 मेंऔरऔर भी

अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ व विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के लिए देश का राजकोषीय घाटा, खासकर जीडीपी से उसका अनुपात बड़ा पवित्र मानक होता है। अपने यहां इसके ऊपर से एफआरबीएम एक्ट के तहत 31 मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3% तक ले आना था। कोरोना महामारी के चलते यह लक्ष्य नहीं पूरा हो सका। अब सरकार ने इसे 2030 तक खिसका दिया है। इस बार 1 फरवरी को बजट पेश हुआ तो वित्तमंत्री निर्मलाऔरऔर भी

जीडीपी की नई सीरीज़ में जो पद्धति अपनाकर गणना की गई है, उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बड़बोले मंत्रियों व नेताओं की बोलती बंद कर दी है। 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का दावा करनेवालों के लिए अब 4 ट्रिलियन की बात करना भी मुश्किल हो गया है। पुरानी पद्धति के अनुसार जनवरी में आए पहले अग्रिम अनुमान वित्त वर्ष 2025-26 में नॉमिनल या वर्तमान मूल्यों पर जीडीपी ₹357.14 लाख करोड़ निकाला गया था। वहीं, नई सीरीज़औरऔर भी

जब दुनिया एप्सटीन फाइलों के खुलासों से निकलकर अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के चलते समूचे मध्य-पूर्व मे फैली अशांति में उलझी हुई थी और हम देश में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति का हिसाब लगा रहे थे, उसके ठीक पहले सरकार ने अर्थव्यवस्था या जीडीपी के साथ बड़ा खेला कर दिया। उसने राष्ट्रीय खातों के डेटा की नई सीरीज़ जारी कर दी, जिसमें जीडीपी और जीवीए की गणना का आधार वर्षऔरऔर भी

आम जीवन की तरह निवेश की दुनिया में भी धारणाए व मान्यताएं हकीकत से टकराकर बराबर टूटती रहती हैं। इसलिए धारणाओं और मान्यताओं से चिपके रहना गलत है। 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल ने ईरान पर हमला किया तो शुरू में जानी-समझी प्रतिक्रिया हुई। शेयर बाज़ार गिर गए, मुद्राएं कमज़ोर पड़ गई और जिंसों के दाम बढ़ गए। सोने के दाम खटाक से 2.15% और चांदी के दाम 1.63% बढ़ गए। कहा जाने लगा कि देश में सोनाऔरऔर भी