हम धारणा पहले बना लेते हैं। फिर तथ्यों को उसमें फिट कर देते हैं। यह सोच अवैज्ञानिक है। हमें अपनी सोच को नए सिरे से ढालना होगा ताकि मान्यताओं के बजाय हम तथ्यों को तरजीह देना सीख सकें।और भीऔर भी

अपनी तसल्ली के लिए मन में यही भाव बैठा लेना श्रेयस्कर है कि हम जो भी काम करते हैं, मूलतः अपने लिए करते हैं, दूसरों के लिए नहीं। दूसरा तो बस बहाना है। वह न होता तो हम निठल्ले पड़े रहते।और भीऔर भी

पत्थर में न तो इच्छा होती है और न द्वेष। उसे न सुख होता है, न दुख। न ही पत्थर अपना रूप बनाए रखना चाहता है, जबकि ये अनुभूतियां ही प्राणियों की पहचान और उनके जीवन का मूल तत्व हैं।और भीऔर भी

जहां कुछ करने के लिए कुछ न करनेवालों की मंजूरी लेनी पड़े, जहां बिचौलियों की मौज और रिश्वत का बोलबोला हो, जहां कानून भी उन्हें ही बचाता हो, वैसे तंत्र का नाश आज नहीं तो कल अवश्यसंभावी है।और भीऔर भी

किसी से मिलते ही हम समानता के बिंदु पहले तलाशने शुरू कर देते हैं। लेकिन समानता से शुरू हुए रिश्ते अंततः तनावग्रस्त हो जाते हैं। वहीं, अगर हम असमानता से शुरू करें तो रिश्ते दीर्घजीवी बनते हैं।और भीऔर भी

वर्तमान से क्षुब्ध, अतीत से मुग्ध और भविष्य से आक्रांत लोग कभी ठीक से नहीं जी पाते। इसलिए नहीं कि वे अभावग्रस्त है, बल्कि इसलिए कि गलत सोच ने उनका मूल मानव तत्व सोख लिया होता है।और भीऔर भी

जो लोग कर्ज, आग, शत्रु व बीमारी, इन चारों को पूरी तरह खत्म किए बिना चैन से नहीं बैठते, उनको बाद में कभी नहीं रोना पड़ता। लेकिन जो इन्हें लोग पाले रहते हैं, वे ताजिंदगी विलाप ही करते रहते हैं।और भीऔर भी

भावुक होना जरूरी है क्योंकि महज बुद्धि के दम पर हम सच तक नहीं पहुंच सकते। लेकिन बुद्धि को कभी इतनी दूर घास चरने नहीं भेज देना चाहिए कि किसी को हमारी भावनाओं से खेलने का मौका मिल जाए।और भीऔर भी

बात किसने कही, यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वह हमारी विचार-श्रृंखला को कहां तक आगे बढ़ाती है, हमारे कितने काम की है। इसलिए विचारों को हमेशा नाम से काटकर देखना चाहिए।और भीऔर भी

जिंदगी में आफत नहीं, मोड़ और उतार-चढ़ाव ही आते हैं। यह एक दुस्साहस भरा सफर है। इसमें जो मोड़ या रास्ता आप चुनते हैं, वही आपकी किस्मत बनता है। ऊंच-नीच जीवन के एडवेंचर का हिस्सा भर है।और भीऔर भी