प्रकृति और समय
यहां सब कुछ बदलता है हर पल। घूमता है, चलता नहीं। एक चक्र है जिसमें चीजें जहां से चली थीं, घूम-फिरकर वहीं कहीं आसपास आ जाती हैं। हां, समय चलता है निरंतर! लेकिन समय तो एक टेक्नोलॉजी है जिसे प्रकृति ने नहीं, हमने ईजाद किया है।और भीऔर भी
यहां सब कुछ बदलता है हर पल। घूमता है, चलता नहीं। एक चक्र है जिसमें चीजें जहां से चली थीं, घूम-फिरकर वहीं कहीं आसपास आ जाती हैं। हां, समय चलता है निरंतर! लेकिन समय तो एक टेक्नोलॉजी है जिसे प्रकृति ने नहीं, हमने ईजाद किया है।और भीऔर भी
कांच बनने से क्या फायदा? जो जैसा आता है, वैसा ही निकल जाता है। बनो तो कम से कम आईना बनो, जिसमें दूसरे अपनी शक्ल देख सकें। सबसे अच्छा तो यह है कि प्रिज्म बनो जिससे निकलकर प्रकाश के सातों रंग अलग-अलग हो जाते हैं।और भीऔर भी
पाप कभी स्थाई नहीं होता। उसे अपरिहार्य या नियति मानना गलत है। सामूहिक हालात और व्यक्तिगत विवेक को हमेशा बेहतर, शुद्ध व तेजस्वी बनाया जा सकता है। इसलिए क्षण के स्थायित्व पर नहीं, उसकी गतिशीलता पर यकीन करें।और भीऔर भी
यथास्थिति को मानो मत। उसे चिंदी-चिंदी करने के लिए लड़ो। इसलिए नहीं कि हम नकारवादी या आस्थाहीन हैं, बल्कि इसलिए कि हमें मानवीय क्षमता पर अगाध आस्था है; हमारी दृढ़ मान्यता है कि हालात को बेहतर बनाया जा सकता है।और भीऔर भी
जख्मों पर मक्खियां और दिमाग में अनर्गल विचार तभी तक भिनभिनाते हैं, जब तक हम अचेत या अर्द्धनिद्रा की अवस्था में रहते हैं। जगते ही हमारा सचेत प्रतिरोध तंत्र सक्रिय हो जाता है तो घातक विचार व परजीवी भाग खड़े होते हैं।और भीऔर भी
सकल पदारथ है जगमाँही, कर्महीन नर पावत नाहीं। लेकिन कर्म से पहले यह तो पता होना चाहिए कि आखिर हमें चाहिए क्या। इसके लिए ज्ञान जरूरी है। ज्ञान से हमारी दुनिया खुलकर व्यापक हो जाती है और हम सही चयन कर पाते हैं।और भीऔर भी
दिन की शुरुआत इससे करें कि किस-किस के प्रति कृतज्ञ हैं तो दिन बड़ा अच्छा गुजरता है। कृतज्ञता का भाव हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल का संचार करता है, जबकि नाराजगी का भाव हमें शिथिल और कमजोर बना देता है।और भीऔर भी
लंबे समय तक किसी गफलत में जीना न खुद के लिए अच्छा है और न ही औरों के लिए। धीरे-धीरे झलकने लगता है कि हम कितने भ्रम में पड़े हुए थे। लेकिन अपनी जिद और जड़ता के कारण हम सच को स्वीकार करने से भागते रहते हैं।और भीऔर भी
विचार आग से निकली चिनगारियों की तरह हैं। उड़ते हैं, मिट जाते हैं। पकड़कर नहीं रख सके तो क्या पछतावा! जरूरी यह है कि जिस आग से वो निकली है, उसे बचाकर रखा जाए। वो सलामत रही तो विचार शब्द बदल-बदलकर आते ही रहेंगे।और भीऔर भी
पहले ही बाधाओं की सोचने लगे तो बाधाओं के इतने बुलबुले फूट पड़ेंगे कि चलना ही रुक जाएगा। आकस्मिकता का इंतजाम होना चाहिए। विफल हो गए तो क्या करेंगे, इसका भी आभास होना चाहिए। पर, मंजिल तो चलने से ही मिलेगी।और भीऔर भी
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