किसी काम की सफलता के लिए अच्छी व सच्ची नीयत होना जरूरी तो है, पर्याप्त नहीं। अक्सर हम सच्ची नीयत के बावजूद एकदम नाकाम हो जाते हैं। कारण, जिस माध्यम पर काम कर रहे होते हैं, उसमें हो रहे बदलावों से हम आंखें मूंदे रहते हैं।और भीऔर भी

विवेक तर्क की स्वाभाविक परिणति है, स्मृति विवेकयुक्त साधना और एकात्मता साधनायुक्त स्मृति की। तर्क विवेक तक ले जाता है। स्मृति अपने उत्स की ओर लौटना है। एकात्मता की अवस्था में तो जीने-मरने जैसे द्वैतभाव ही मिट जाते हैं।और भीऔर भी

झूठ और लूट के इस दौर में कोई कोना पकड़कर जी लेना आसान है। हज़ारों-लाखों जिंदगियों को प्रभावित करनेवाला उद्यम खड़ा करना काफी कठिन है। लेकिन सबसे कठिन है झूठ और लूट के तंत्र को बेनकाब करते हुए सच्चे राष्ट्र का निर्माण।और भीऔर भी

पढ़ा बहुत कुछ, पचाया कुछ नहीं तो बुद्धि पर चर्बी चढ़ जाती है। उसी तरह जैसे खाना अगर पूरा पचा नहीं तो शरीर पर चर्बी बनकर चढ़ता जाता है। इसलिए पढ़ें उतना ही, जितना पचा सकें। ध्यान दें, ज्यादातर बुद्धिजीवी अपच के शिकार होते हैं।और भीऔर भी

दुत्कारा गया जानवर, भिखारी या गरीब किसी कोने में दुबक कर रह जाता है। वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन सत्ता के गलियारों से तिरष्कृत विष्णु गुप्त एक दिन चाणक्य बन पूरे नंद वंश का ही नाश कर नई सत्ता बना डालता है।और भीऔर भी

संविधान कोई कविता, कहानी या उपन्यास नहीं है जिसे कोई एक व्यक्ति अपने दम पर लिख सके। लेकिन अपने यहां दलितों की मासूम भावनाओं को फायदा उठाने के लिए ऐसा राजनीतिक पाखंड खड़ा किया गया है कि हर किसी की बोलती बंद है।और भीऔर भी

इंसान और विपक्ष का असली चरित्र तभी खुलता है जब उसे सत्ता मिलती है। तभी पता चलता है कि वो कितना संत था और कितना ढोंगी, उसकी बातों में कितनी लफ्फाजी थी और कितनी सच्चाई। संत तो सत्ता पाकर भी सृजनरत रहता है।और भीऔर भी

कानून ही लंबे समय में व्यापक सामाजिक स्वीकृति पाने के बाद नैतिकता बन जाते हैं। फिर भी नैतिकता सर्वकालिक नहीं होती। किसी नैतिक मानदंड के सही होने का एक ही पैमाना है कि वह व्यापक समाज के वर्तमान व भावी हित में है या नहीं।और भीऔर भी

स्वार्थ पर टिकी इस दुनिया में भी लोग परमार्थी हो सकते हैं। लेकिन कोई हमारा इतना हितैषी क्यों बन रहा है? दूसरे की सलाह पर गौर करते हुए हमें खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए। अपने स्वार्थ की साफ समझ इसी तरह से बनती है।और भीऔर भी

किसी इंसान के बुद्धिमान या धनवान होने का मतलब यह नहीं कि उसने अपनी पशु-वृत्तियों पर काबू पा लिया है; बल्कि सत्तावान होते ही उसकी पशु-वृत्तियां और प्रबल हो जाया करती हैं। केवल ज्ञानवान ही पशु-वृत्तियों का शमन कर पाते हैं।और भीऔर भी