छोटे उद्योग-धंधों के भुगतान की समस्या हल करने के लिए ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) जनवरी 2017 से लागू कर दिया गया। फिर भी यह समस्या उस गति से नहीं सुलझी, जिस गति से सुलझनी चाहिए थी। 2021 के अंत तक इन एमएसएमई इकाइयों का ₹10.7 लाख करोड़ का भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों के पास अटका पडा था। मार्च 2024 तक भी यह रकम घटकर ₹7.34 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। यह रकम अब भी देश के सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) का 4.6% ठहरती है। बैंकों ने छोटी इकाइयों के लिए इनवॉयस डिस्काउटिंग की सुविधा भी बढ़ा दी। लेकिन दिक्कत यह है कि बैंक जिस खरीदार ने भुगतान रोक रखा है, उसकी साख परखने के बजाय उस छोटी इकाई की खास पर सवाल उठाते हैं जो अपना माल खरीदार को बेच चुका है और बिक्री की रसीद लेकर टहल रहा है। ट्रेड्स पर अमल के बाद यह समस्या हल हो जानी चाहिए थी क्योकि यह सिस्टम बड़ा व्यवस्थित है। इसमें एमएसएमई को बड़े कॉरपोरेट खरीदार को माल डिलीवर कर देने के बाद इनवॉयस को ट्रेड्स के प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर देना होता है। खरीदार प्लेटफॉर्म पर लॉग-इन कर इनवॉयस को स्वीकार करता है। वहां से फैक्टरिंग यूनिट बनती है जिसे आधार बनाकर बैंक छोटी इकाई को एकाध दिन में ही कम ब्याज़ पर फाइनेंस दे देते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…
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