हमारे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के नियमित प्रवाह से देशी वित्तीय संस्थाओ का दम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन इसकी दशा-दिशा तय करने में अब भी विदेशी पूंजी का अहम रोल है। इस विदेशी पूंजी का प्रोफाइल साल 2017 में भारत-मॉरीशस टैक्स संधि में संशोधन और सेबी के कड़े नियमों के बाद काफी बदल गया है। 2015 तक भारत में आ रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में मॉरीशस के पते वाली फर्मों का हिस्सा 20.5% हुआ करता था, जो अब महज 4.1% रह गया है। वहीं, इन्हीं दस सालों में अमेरिका से आनेवाले निवेश का हिस्सा 34% से बढ़कर 44% हो गया है। पहले भारतीय प्रवर्तकों व अमीरों का कालाधन मॉरीशस से वापस एफपीआई बनकर लौट आता था। अब ऐसा करना मुश्किल है। विदेशी निवेशकों में अब कोई भ्रम या छलावा नहीं है। उन्होंने बीते साल 2025 में भारतीय शेयर बाज़ार से एशिया में सबसे ज्यादा 18.8 अरब डॉलर की रिकॉर्ड निकासी की। इस साल भी जनवरी महीने में वे इसके ऊपर से 3.98 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। कारण, एक तो भारतीय शेयर बाज़ार बहुत महंगा है। दूसरे, भारतीय कंपनियों का शुद्ध लाभ 10% से भी कम बढ़ रहा है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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