जीडीपी की नई सीरीज़ में केवल आधार वर्ष 2011-12 से बढ़ाकर 2022-23 ही नहीं किया गया है, बल्कि इसमें बेहद बारीक स्तर पर करीब 600 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए गए हैं, जबकि पिछली सीरीज़ में मोटे तौर पर ऐसे 180 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए जा रहे थे। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि इसमें आगे सेवा क्षेत्र के डिफ्लेटर भी जोड़ लिए जाएंगे। लेकिन दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था में रोज़गार व बेरोज़गारी की स्थिति को क्यों तवज्जो नहीं दी जा रही है? कारण यह है कि सरकार रोज़गार की जो भी आधी-अधूरी जानकारी दे रही है, वो भी विकास की सारी गुलाबी तस्वीर को पीलिया बना देती है। सरकार ने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) की जो पद्धति अपनाई है, उसके हिसाब से जनवरी 2026 से पहले के दस महीनों में बेरोज़गारी की औसत दर 5.2% रही है। 16 मार्च को जारी ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक फरवरी 2026 में यह दर 4.9% है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले 2011-12 में बेरोज़गारी की दर 3.7% रही थी। उसके बाद बराबर इससे ज्यादा ही रही है। 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोज़गारी की दर 2011-12 में 7.7% थी, जबकि 2023-24 में 10.2% पर पहुंच गई। साफ है कि मोदी सरकार की नीतियों ने देश में बेरोज़गारी बढ़ाई है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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