जिनका मकसद येनकेन प्रकारेण सत्ता हासिल करना और फिर उसका इस्तेमाल दलगत व व्यक्तिगत हितों के लिए करना हो, उनके लिए राष्ट्रीय हित जनता को लुभाने के जुमले भर बनकर रह जाते हैं। दुनिया के उद्योग-धंधों में रेअर अर्थ का महत्व 15 साल पहले तब उभरकर सामने आया है, जब चीन ने इन तत्वों के खनन में एकाधिकार जमाकर सबको छकाना शुरू कर दिया। जर्मन ऑटो कंपनी बीएमडब्ल्यू तो नियो-डाइमियम के दामों मे उछाल के बाद 2011 में ही बिना रेअर अर्थ तत्व वाले मोटर विकसित करने में लग गई। मोदी सरकार चाहती तो 2014 में सत्ता संभालते ही चीन के दबाव से मुक्त होकर रेअर अर्थ में भारत को आत्मनिर्भर बनाने में जुट जाती। लेकिन उसकी तंद्रा 11 साल बाद नवंबर 2025 में खुली और तब उसने देश में रेअर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) बनाने की ₹7280 करोड़ की नई स्कीम पेश की। इस स्कीम में चुनिंदा निर्माताओं को सात साल के भीतर 6000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट प्रतिवर्ष बनाने के लिए पूंजी व प्रोत्साहन दिए जाने हैं। फिर बजट में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में समर्पित रेअर अर्थ कॉरिडोर बनाने का शिगूफा छोड़ दिया गया। कमाल है कि सारी घोषणाओं में सरकारी कंपनी इंडियन रेअर अर्थ्स लिमिटेड का कहीं कोई जिक्र नहीं। ऐसे में सरकार की मंशा पर शक होना स्वाभाविक है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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