छौंक विकसित भारत की, चौंका रोज़गार

हमारी सरकार और उसमें ऊंचे पदों पर बैठे नीति-नियामक किसके लिए नीतियां बनाते हैं, यह इसी बात से साफ हो जाता है कि वे समय-समय पर अर्थव्यवस्था को लेकर जब भी घोषणाएं करते हैं, उसमें बेरोज़गारी का जिक्र भूल-चूक से भी नहीं होता। हालांकि प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के लिए आजकल विकसित भारत और रोज़गार हर कार्यक्रम में लगाया जानेवाला तड़का बन गया है। पहली अप्रैल से शुरू हो रही नई जनगणना के विज्ञापनों में भी ‘विकसित भारत@2047’ की छौंक लगा दी गई है। हर साल देश का आर्थिक सर्वेक्षण तैयार करनेवाले मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने 2026 के सर्वेक्षण में अपनी पीठ थपथपाते हुए लिखा था कि हमने विकास को आगे बढ़ाने की नीतियां अपनाई और मुद्रास्फीति को नांथने व थामने का काम किया। हकीकत यह है कि विकास का सारा डेटा फर्जी है और मुद्रास्फीति सरकार की किसी आर्थिक नीति या रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति से नहीं, बल्कि भगवान भरोसे चल रही कृषि में पैदावार बढ़ने से सस्ती हुई खाद्य वस्तुओं के चलते काबू में आई है। अभी मध्य-पूर्व में छिड़े युद्ध से नागेश्वरन के हाथ-पैर फूल गए तो उन्हें कहना पड़ा कि 2026-27 में जीडीपी के 7-7.4% बढ़ने के पिछले अनुमान में काफी कमी आ सकती है और रिटेल मुद्रास्फीति बढ़कर 5.5% हो सकती है। अब सोमवार का व्योम…

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