ऊपर-ऊपर देखें तो हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी का मूल उद्देश्य निवेशकों के हितों की हिफाजत करते हुए सिक्यूरिटीज़ बाज़ार का विकास व नियमन करना है। लेकिन सतह के नीचे देखें तो सेबी सिक्यूरिटीज़ बाज़ार को बढ़ाने के लिए निवेशकों के हितों को दरकिनार करती रही है। जैसे, इंट्रा-डे ट्रेडिंग शेयर बाज़ार में कैश सेगमेंट का सबसे रिस्की हिस्सा है। लेकिन शुरुआत से ही उसने नियम बना रखा है कि केवल रिटेल व्यक्तिगत निवेशक/ट्रेडर ही इंट्रा-डे ट्रेडिंग कर सकते हैं। इसी तरह वो इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट में व्यक्तिगत ट्रेडरों को हो रहे नुकसान पर रिपोर्ट निकालती रही है। उसने इसे रोकने के लिए कई उपाय किए हैं। लेकिन सीधा-सा उपाय वो नहीं करती कि ऑप्शंस ट्रेडिंग को रिटेल ट्रेडरों के लिए बंद कर दे। दरअसल, रिटेल ट्रेडर हट जाएंगे तो स्टॉक एक्सचेंजों, ब्रोकरों व डिपॉजिटरी कंपनियों के साथ-साथ सरकार और खुद सेबी की कमाई घट जाएगी। सेबी दिखाती ज़रूर है कि उसे साप्ताहिक एफ एंड ओ सौदों के बढ़ते वोल्यूम से चिंता है। लेकिन वो ऐसा कुछ नहीं करेगी, जिससे पूंजी बाज़ार से कमा रहे बिचौलियों और सरकार व उस पर कोई आंच आए। यह साफ-साफ हितों का टकराव है। एक तरफ रिटेल या छोटे व आम व्यक्तिगत निवेशक हैं, दूसरी तरह बाज़ार से जुड़े तमाम मध्यवर्ती। सेबी मध्यवर्तियों को तरजीह दे रही है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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