मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था के साथ 11 सालों से जीडीपी को बढ़ाकर दिखाने का छल कर रही है, जबकि ज़मीनी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। खपत घट रही है। लोगों पर कर्ज बढ़ रहे हैं। कंपनियां देश में नया निवेश न करके बाहर भाग रही हैं। आम लोगों पर ही नहीं, उद्योग धंधों पर भी टैक्स का बोझ बढ़ता जा रहा है। जिस सॉफ्टवेयर क्षेत्र ने जमकर नौकरी दे रखी थी, वो छंटनी करने को मजबूर है। आखिर संभावना से भरे देश में असल समस्या कहां है? समस्या यह है कि 11 सालों में सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति तो मजबूत होता गया। लेकिन संस्थाएं कमज़ोर होती चली गईं। कैसी विडम्बना है कि नीचे भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी बढ़ गई है। कहने को बिजनेस करने की आसानी में भारत की रैंक 2014 के 142वें स्थान से 2020 तक घटकर 63 पर आ गई। लेकिन टीमलीज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब भी मैन्यूफैक्चरिंग में एमएसएमई की एक इकाई को साल भर में सरकार से 1450 से ज्यादा मंज़ूरियां लेनी पड़ती हैं। इनमें अलग-अलग शर्तों के लिए 59 तरह के इंस्पेक्टर, 48 अलग रजिस्टर और जेल में डालने के 486 क्लॉज शामिल हैं। इन शर्तों को पूरा करने का सालाना खर्च ₹13 लाख से ₹17 लाख आता है। इतने खर्च के बाद आखिर कोई छोटी इकाई कैसे लाभ में रह सकती है? यही नहीं, बिना लाभ वाले एनजीओ भी सरकारी तंत्र और शर्तों से त्रस्त हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…
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