आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि भारत विपुल प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधनों के बावजूद चीन से ललकार कर बात नहीं कर पा रहा? असल में यह भारत की नहीं, देश की सत्ता पर बारह साल से कुंडली मारे बैठी मोदी सरकार की मजबूरी है। जिस तरह मोदी सरकार ट्रम्प को दो-टूक जवाब इसलिए नहीं दे पा रही क्योंकि न्यूयॉर्क की अदालत ने घूसखोसी के मामले में अडाणी की पूंछ दबा रखी है, उसी तरह अडाणी के व्यवसायिक हित चीन के साथ जुड़े हैं जिन्हें मोदी सरकार भारत के राष्ट्रीय हितों की कुर्बानी देकर भी बचाना चाहती है। अडाणी समूह ने शांघाई में अपनी नई सब्सिडियरी अडाणी एनर्जी रिसोर्सेज़ के जरिए सप्लाई चेन व प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सेवाएं शुरू की हैं। गौतम अडाणी जून 2025 में चीन की कंपनी जिंको सोलर की फैक्टरी देखने गए और उससे अक्षय ऊर्जा का करार करने की फिराक में हैं। अडाणी का मूंदड़ा में चीन के ईस्ट होप ग्रुप के साथ पुराना करार है। अब चीन की बीवाईडी ऑटो जैसी कंपनी से बैटरी टेक्नोलॉज़ी लेने की कोशिश चल रही है। अमेरिका में ट्रम्प के साथ हुई प्रेसवार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अडाणी के केस को लेकर सवाल पूरा गया तो उन्होंने हाथ हिलाकर कहा कि ऐसे व्यक्तिगत मामलो के लिए न दो देशों के मुखिया मिलते हैं, न बात करते हैं। लेकिन चीन के प्रति उमड़ी मोहब्बत पर आज सारा देश सवाल पूछ रहा है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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