शेयर बाजार के तंत्र से जुड़ी संस्थाओं की लिस्टिंग नहीं: जालान समिति

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी की तरफ से भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में गठित समिति ने शेयर बाजार के तंत्र से जुड़ी तीन संस्थाओं – स्टॉक एक्सचेंजों, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन के मालिकाने, स्वरूप और उनके आपसी संबंधों में व्यापक फेरबदल की सिफारिश की है। उसका कहना है कि किसी भी स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरी या क्लियरिंग कॉरपोरेशन की लिस्टिंग नहीं होनी चाहिए। समिति ने सोमवार, 22 नवंबर को अपनी रिपोर्ट सेबी को सौंपी, जिसे मंगलवार, 23 नवंबर को सार्वजनिक किया गया।

85 पन्नों की इस रिपोर्ट पर सभी संबंधित पक्षों से 31 दिसंबर 2010 तक प्रतिक्रियाएं मांगी गई हैं जिन्हें rajeshkd@sebi.gov.in पर ईमेल किया जा सकता है। सारी प्रतिक्रियाओं पर विचार के बाद सेबी का बोर्ड समिति की सिफारिशों को अंतिम रूप देगा। समिति का गठन 6 जनवरी 2010 को किया गया था। समिति की एक प्रमुख चिंता देश के दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों बीएसई और एनएसई में कारोबार का बढ़ता अंतर है। रिपोर्ट में लिखा गया है कि जानामाना तथ्य है कि तरलता और भी तरलता को खींचती है। जहां आसानी से सौदे पूरे हो जाते हैं, लोग वहीं सौदे करना पसंद करते हैं। इससे एक तरह का असंतुलन बन रहा है। ऐसे और भी कई पहलू हैं जिनके मद्देनजर कहा जा सकता है कि देश में एकल ट्रेडिंग सिस्टम, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी से फायदा होगा।

समिति के सदस्य सचिव और सेबी के कार्यकारी निदेशक जे पी गुप्ता ने भी शाम को बीएसई द्वारा आयोजित एक समारोह में कहा कि आज बाजार में लिक्विडिटी के बिखराव (फ्रैगमेंटेशन) को कम करने की जरूरत है। अभी एक एक्सचेंज में लिक्विडिटी ज्यादा है, दूसरे में कम है। देश में कोई एक क्लियरिंग हाउस नहीं है। एनएसई, एमसीएक्स-एसएक्स और बीएसई सभी ने अपने अलग-अलग क्लियरिंग कॉरपोरेशन बना रखे हैं। डिपॉजिटरी भी दो हैं – एनएसडीएल और सीडीएसएल। इसके चलते सौदों को रूट करने में दिक्कत आती है। जालान समिति के मुताबिक इस समस्या को हल करने की जरूरत है।

समिति ने स्वीकार किया है कि स्टॉक एक्सचेंज व्यापक जनहित को पूरा करने के माध्यम हैं। लेकिन उसका कहना है कि एक्सचेंजों में प्रवर्तक की हिस्सेदारी को 5 या 15 फीसदी तक सीमित रखने से वो इस अहम संस्थान को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लेगा। इसलिए समिति ने मौजूदा नियमों में भी बदलाव की सिफारिश की है। इन सिफारिशों से एमसीएक्स- एसएक्स जैसे नए एक्सचेंज को फायदा हो सकता है जिन्हें सेबी इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत नहीं दे रही है।

समिति का कहना है कि सेबी को स्टॉक एक्सचेंजों के बीच सदस्यों की फीस व एंट्री जैसे मसलों पर अंतर खत्म कर समान धरातल पैदा करने के लिए ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उसकी यह सलाह भी एमसीएक्स समूह के पक्ष में जाती है क्योंकि उसकी प्रमुख शिकायत रही है कि एनएसई ने अपने एकाधिकार का इस्तेमाल कर फीस एकदम कम कर दी है जिससे उसका धंधा चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। इस संदर्भ में समिति का कहना है कि भारत में स्वतंत्र एसआरओ (सेल्फ रेगुलेटरी ऑर्गेनाइजेशन) का मॉडल नहीं चल सकता।

जालान समिति ने पूंजी बाजार में दो घोटालों के बाद बनी संयुक्त संसदीय समितियों (जेपीसी) की सकारात्मक भूमिका को भी स्वीकार किया है। उसका कहना है कि इससे हमारे नियमन ढांचे को दुरुस्त करने में मदद मिली है। समिति के मुताबिक स्टॉक एक्सचेंजों में रणनीतिक निवेशकों को लाने की जरूरत है। साथ ही उसकी सिफारिश है कि स्टॉक एक्सचेंजों की न्यूनतम नेटवर्थ 100 करोड़, डिपॉजिटरी की 100 करोड़ और क्लियरिंग कॉरपोरेशन की 300 करोड़ रुपए होनी चाहिए। इसमें से स्टॉक एक्सचेंज व डिपॉजिटरी की मौजूदा नेटवर्थ की सीमा 100 करोड़ रुपए ही है।

समिति की सिफारिश है कि क्लियरिंग कॉरपोरेशन की चुकता पूंजी का कम से कम 51 फीसदी हिस्सा एक या अनेक स्टॉक एक्सचेजों के पास होना चाहिए। लेकिन डिपॉजिटरी में स्टॉक एक्सचेंजों की अधिकतम सीमा 24 फीसदी पर बांधी जा सकती है। समिति की बेहद अहम और संवेदनशील सिफारिश है कि सभी एमआईआई (मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस यानी स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरी व क्लियरिंग कॉरपोरेशन) में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को शेयरधारिता की अनुमति दी जानी चाहिए।

संलग्न: Jalan-sebi report

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