आज की तारीख बड़ी अहम है। ठीक 95 साल पहले 23 मार्च 1931 को 23-23 साल के ही तीन नौजवानों भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाकर भारत का सुंदर भविष्य बनाने के लिए सरकार से माफी मांगने के बजाय फांसी पर चढ़ना कुबूल किया था। भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के ठीक पहले देशवासियों को एक ही संदेश दिया: साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब ज़िंदाबाद। फांसी के ठीक पहले तीनों ने अपने हाथ आपस में जोड़कर एक साथ अपना प्रिय गीत गाया था – कभी वो दिन भी आएगा कि जब हम आज़ाद होंगे. ये अपनी ही ज़मीं होगी. ये अपना आसमां होगा। भगत सिंह ने दो विचार बडे साफ तौर पर रखे थे। एक, क्रांति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। दो, क्या फर्क पड़ेगा कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज़ सत्ता में आ जाएंगे। लॉर्ड इर्विन की जगह अगर सर तेज बहादुर सप्रू आ जाएंगे तो क्या फ़र्क पड़ेगा? इसलिए राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ आर्थिक व सामाजिक आज़ादी भी ज़रूरी है। क्या आज़ादी के 79 साल बाद भी शहीद नौजवानों के सपने हमारी सरकार का एजेंडा बन पाए हैं? अब सोमवार का व्योम…
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