इरडा बनी उद्योग की एजेंट, बीमा एजेटों को राहत, कड़े नियम ढीले

देश में वित्तीय क्षेत्र के नियामकों में बीमा नियामक संस्था आईआरडीए (इरडा) के बारे में माना जाता है कि वह बीमाधारकों के नहीं, बल्कि बीमा उद्योग के हित में काम करती है। उसने एक बार फिर यह बात सही साबित कर दी है। इरडा ने बीमा एजेंटों के बारे में इस साल फरवरी में बनाए गए और 1 जुलाई 2011 से लागू नियमों को उद्योग के दबाव में बदल दिया है।

पहले तय किया गया था कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 से उन्हीं बीमा एजेंटों के लाइसेंस रिन्यू किए जाएंगे जिनके द्वारा बेची गई कम से कम 50 फीसदी पॉलिसियां लैप्स नहीं हुई हैं और उनमें बराबर प्रीमियम आ रहा है। एजेंटों पर न्यूनतम 50 फीसदी पॉलिसियों की निरतंरता की शर्त वित्त वर्ष 2013-14 तक लागू होनी थी। उसके अगले साल 2014-15 से यह अनुपात कम से कम 75 फीसदी हो जाना था। लेकिन इरडा ने एक तो इस नियम के लागू होने का साल ही बढ़ाकर 2014-15 कर दिया है। दूसरे उसने पॉलिसियों की निरंतरता का न्यूनतम अनुपात अब एकसमान 50 फीसदी कर दिया है।

इरडा ने मंगलवार को जारी ताजा सर्कुलर में कहा है कि उसने ऐसा उद्योग के प्रतिनिधित्व और जीवन बीमा पॉलिसियों में निरतंरता के उच्च स्तर को सुनिश्चित करने के लिए किया है। इन सरकारी संस्थाओं के शब्द कितने खोखले होते हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लागू करने की समयसीमा तीन साल बढ़ाने और न्यूनतम स्तर 75 से घटाकर 50 फीसदी कर देने के बावजूद इरडा ‘उच्च स्तर को सुनिश्चित’ करने की बात कर रही है।

इरडा ने एक और चमत्कार किया है कि सात महीने के भीतर ही उसने ‘रिश्तेदार’ की परिभाषा बदल दी है। फरवरी में उसने तय किया था कि किसी बीमा कंपनी के एजेंट के पत्नी या पति, बहन, भाई, माता-पिता, बेटे, बहुएं, बेटियां और दामाद उस कंपनी के एजेंट नहीं बन सकते। लेकिन अब रिश्तेदार की परिभाषा में केवल पति-पत्नी, आश्रित सगे बच्चों या सौतेले बच्चों को रखा गया है। बाकी माता-पिता, भाई-बहन और बेटी-दामाद सभी को बाहर कर दिया है। इस समय बीमा एजेंट अपना धंधा खानदानी सफाखाने की तरह चलाते हैं। इसलिए वे अपनी सुविधा को बदले जाने के खिलाफ थे।

नए नियम का कोई मतलब नहीं है क्योंकि जो आश्रित होता, वह कोई काम करेगा ही क्यों। फिर निर्भरता खत्म होते ही वह अपने मां-बाप की एजेंटी अपना सकता है। वैसे भी, यह नियम उन्हीं एजेंटों पर लागू होगा जिन्हें लाइसेंस 1 जुलाई 2011 या इसके बाद जारी किया जाएगा।

गौरतलब है कि देश में इस समय करीब 30 लाख बीमा एजेंट काम कर रहे हैं। हालांकि उद्योग की तरफ से दावा किया गया है कि इनकी संख्या पिछले साल बीमा पॉलिसियों, खासकर यूलिप से जुड़े नियम कड़े कर देने के बाद घटकर 27 लाख पर आ गई है। बीमा पॉलिसियों के लैप्स होने की समस्या भी काफी विकराल है। दिक्कत यह है कि इरडा इसका कोई नियमित आंकड़ा नहीं जारी करती। लोगबाग सही तथ्य जानने के लिए आरटीआई दाखिल करते रहते हैं। पिछले साल जनवरी में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक वित्त वर्ष 2008-09 में कुल 91 लाख जीवन बीमा पॉलिसियां लैप्स हो गई थीं जो कुल जारी पॉलिसियों की 50 फीसदी से ज्यादा थीं।

हां, इरडा बीमाधारकों तक अपनी बात पहुंचाने या पारदर्शिता के बारे में कितनी गंभीर है, इसका एक नमूना पेश है। उसके 20 सितंबर 2011 को जारी सर्कुलर में एक शब्द इस्तेमाल किया है – mutatis mutandis , जिसका आसान मतलब है कि अभी जो बदला गया है, उसके अलावा पहले जारी सर्कुलर की बाकी बातें उसी रूप में लागू रहेंगी। सवाल उठता है कि बीमाधारकों के हित का दम भरनेवाली और अवाम के धन पर पल रही इरडा के लिए क्या सीधी बात न कहकर लैटिन के भारी-भरकम शब्द का इस्तेमाल जरूरी था।

1 Comment

  1. क्या एक बीमा एजेंट पोस्ट आफिस में भी एजेंसी लेकर कार्य कर सकता है ,

    यानि एक ही व्यक्ति बीमा क्षेत्र में और पोस्ट आफिस में दोनों में एक साथ कार्य कर सकता है , या नहीं

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