कैसा राष्ट्र-निर्माण, हो रहा राष्ट्र-विनाश!

किसी भी देश का बनना-बिगड़ना उसके प्राकृतिक व मानव संसंधनों के कुशल नियोजन पर निर्भर करता है। यही राष्ट्र-निर्माण का बुनियादी आधार है। भारत के पास तो पांच हज़ार पुरानी सभ्यता की समृद्ध विरासत भी है। लेकिन जिस तरह मोदी सरकार बारह सालों से देश के प्राकृतिक संसाधनों को अडाणी व अम्बानी जैसे चंद यारों के हवाले करती जा रही है और उसने 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, दस करोड़ किसानों को सरकारी अनुदान, 11 करोड़ मजदूरों को अधिकार विहीन और 45 करोड़ युवाओं को दर-दर भटकने को मजबूर कर दिया है, उससे भारत की विकास-गाथा दारुण-कथा बन चुकी है। हर तरफ शोर है, चीख-चिल्लाहट है, साम्प्रदायिक उन्माद व तनाव है। छल, प्रपंच, झूठ, दलाली व भ्रष्टाचार की भरमार है। हमारी अनूठी शक्ति व संपदा का क्षरण होता जा रहा है। जहां 146 करोड़ देशवासी, 121 प्रमुख भाषाएं, खानपान से लेकर पहनावे तक विपुल सांस्कृतिक विविधता और प्राकृतिक उपहार बरसते हों, वहां किसी भी एआई मॉडल की ट्रेनिंग के लिए डेटा की कोई कमी कैसे हो सकती है! लेकिन सत्ता पर अजगरी फांस बनाए संघ परिवार की ट्रेनिंग ही नकली राष्ट्रवाद चलाकर असली राष्ट्रवाद को तोड़ने और देश से गद्दारी में हुई है तो परमाणु ऊर्जा कानून भी गूगल व अमेज़न के डेटा सेंटर को निर्बाध बिजली देने के लिए बनते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…

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