मेक इन इंडिया का कार्यक्रम चलाया तो विदेशी कंपनियों से खुलकर कहा कि भारत में आकर बनाओ और दुनिया भर में बेचो। लेकिन 11 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद स्थिति यह है कि देश में जितना विदेशी पूंजी निवेश आ रहा है, उससे ज्यादा स्वदेशी निवेश बाहर जा रहा है। स्वदेशी मैन्यूफैक्चरिंग का भट्ठा बैठ गया, जबकि उद्योग-धंधों में चीनी घुसपैठ बढ़ गई। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में एआई का विशाल वैश्विक सम्मेलन कर विदेशी कंपनियों को डेटा सेंटर बनाने का न्यौता दे रहे हैं। इसकी भूमिका बजट में तैयार कर दी गई थी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्ताव रखा कि, “डेटा सेंटर में निवेश को गति देने के लिए ऐसी किसी भी विदेशी कंपनी को 2047 तक टैक्स-अवकाश दिया जाएगा जो भारत में डेटा सेंटर की सेवाओं का इस्तेमाल कर दुनिया भर में ग्राहकों को क्लाउड सेवाएं उपलब्ध कराएगी।” क्या भारत में टीसीएस से लेकर इन्फोसिस व विप्रो जैसी किसी भी बड़ी आईटी कंपनी में ऐसा निवेश करने व सेवा देने की पूरी क्षमता नहीं है? फिर उन्हें छोड़कर केवल विदेशी कंपनियों पर मेहरबानी क्यों? इसलिए क्योंकि गूगल, एएमडी व अमेज़ॉन जैसी अमेरिकी कंपनियों ने ही यह नीति बनवाई है। संसद में हल्ला मचा तो वित्तमंत्री ने सफाई दी कि यह प्रावधान इसलिए है ताकि भारतीय डेटा बाहर न जा सके। फिर बजट में ऐसा साफ क्यों नहीं? अब मंगलवार की दृष्टि…
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