जब रिजर्व बैंक तक मौद्रिक नीति समीक्षा में चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली या जून तिमाही में जीडीपी की विकास दर के बहुत हुआ तो 6.5% रहने का अनुमान जा रहा था, तब सरकार ने शुक्रवार, 29 अगस्त को घोषित किया कि हमारा जीडीपी असल में 7.8% बढ़ा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. नागेश्वरन ने जब प्रेस कॉन्फेंस में यह घोषणा की तो सभी अचंभित रह गए। हर तरफ जब अर्थव्यवस्था में समस्याएं ही समस्याएं दिख रही हों, तब किसी के लिए भी इस ‘चमत्कार’ को पचा पाना मुश्किल है। अवाम की वास्तविक आय घटने से परसनल केयर और उपभोक्ता उत्पादों की मांग कमज़ोर पड़ी है। ऊपर से कच्चे माल व लागत सामग्रियां महंगी होने से कंपनियों की हालत खराब है। आर्थिक विषमता बढ़ गई है। सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की 40% दौलत है। कच्चे तेल के आयात पर हमारी निर्भरता 78-80% से बढ़ते-बढ़ते दुनिया में सबसे ज्यादा 90% हो गई है। आर एंड डी पर हमारा खर्च सालों-साल से जीडीपी के 0.65% पर अटका है जबकि चीन इस पर जीडीपी का 2.43%, दक्षिण कोरिया 4.5% और अमेरिका 2.8% खर्च करता है। फिर भी असल जीडीपी के 7.8% बढ़ने से पीछे 3% मुद्रास्फीति के बजाय महज 1% डिफ्लेटर रखने का छल है। जीडीपी की नॉमिनल विकास दर पहली तिमाही में 8.8% ही रही है जो इस बार के बजट अनुमान 10.1% से 1.3% नीचे है। अब सोमवार का व्योम…
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