रिजर्व बैंक का डेटा बताता है कि ‘हम भारत के लोगों’ की वित्तीय आस्तियां वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹34.3 लाख करोड़ और देनदारियां ₹18.8 लाख करोड़ यानी, देनदारियां आस्तियों की 54.81% हो गईं। यह 1970-71 के बाद के 53 सालों का सर्वोच्च स्तर है। कोरोना से घिरे वर्ष 2021-22 तक में लोगों की देनदारियां आस्तियों की 34% थीं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के बाद से ही लोगबाग बचा कम और उधार ज्यादा ले रहे हैं। यही नहीं, वे बैंकों से कहीं ज्यादा ऋण अधिक ब्याज देकर गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों से रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ले रहे हैं। परिवारों का ऋण जून 2024 तक देश के जीडीपी का 42.9% हो चुका था। इस बार के बजट में ₹12 लाख तक की आय को इनकम टैक्स से मुक्त कर देने के बाद सरकार ने कहा था कि यह एक ऐसा आर्थिक सुधार है जिससे मध्यवर्ग के हाथों में खर्च के लिए ज्यादा धन बचेगा। लेकिन रोज़गार और कौशल विकास का क्या हुआ? मध्यवर्ग की पस्त हालत देख कॉरपोरेट क्षेत्र भी पूंजी निवेश के लिए बैंकों से ऋण नहीं ले रहा। कैपिटलाइन डेटाबेस के मुताबिक देश की करीब 3500 लिस्टेड कंपनियों में से 303 कंपनियां 2024-25 में ऋण-मुक्त हो गईं और उनका कैश रिजर्व साल भर में ही ₹21,478 करोड़ से सीधे 135% या दोगुना से ज्यादा बढ़कर ₹50,463 करोड़ हो गया है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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