दुनिया के रंगमंच पर भारत की इस समय विचित्र स्थिति है। विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था के बेदम हाल को देखकर किनारा कस रहे हैं। विदेश में कार्यरत भारतीयों को जगह-जगह उलाहना का पात्र बनना पड़ रहा है। जब पता चलता है कि जर्मनी में काम कर रहे भारतीय लोग वही काम कर रहे जर्मनों से 20% ज्यादा कमा रहे हैं, साथ ही भारत में क्रिसमस के मौके पर ईसाइयों पर हमले होते हैं तो यूरोप के कई देशों में नफरत के नात्सी बीज अंदर ही अंदर कुलबुलाने लगे हैं। ऊपर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सबसे कमज़ोर समझकर भारत पर निशाना साध रखा है। धीरे-धीरे यह भी साफ हो चला है कि खुद को विश्वगुरु के रूप में प्रक्षेपित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया भर के नेताओं के गले इसलिए पड़ते हैं ताकि भारत का हित नहीं, बल्कि अपने परममित्र अडाणी को धंधा दिलवा सकें। बीते साल 2025 में मोदी ने पिछले एक दशक की सबसे ज्यादा विदेश यात्राएं कीं। हाल ही में वे जॉर्डन, इथियोपिया व ओमान के दौरे पर इसीलिए गए थे ताकि अडाणी के कुछ नए प्रोजेक्ट का रास्ता साफ कर सकें। ट्रम्प ने सीधे-सीधे मोदी को हमला करके दुनिया की निगाहों ने भारत जैसे विशाल संभावना वाले देश को जोकर बना दिया है। मोदी की इस कमज़ोर छवि से भारत को मजबूरन कभी रूस तो कभी हमारे दुश्मन देश चीन की शरण में जाना पड़ रहा है। अब सोमवार का व्योम…
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