विदेशी निवेश खासकर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई / एफआईआई) का शुद्ध मकसद भारत जैसे देशों के वित्तीय बाज़ार से झटपट ज्यादा कमाकर फुर्र हो जाना है। वे कतई इसकी परवाह नहीं करते कि उनके अचानक निकल जाने से उस देश के वित्तीय बाज़ार और खासकर उसकी मुद्रा पर कितना प्रतिकूल असर पड़ेगा। पिछली बार अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2013 में 85 अरब डॉलर के बजाय 75 अरब डॉलर के बांड खरीदने शुरू किए। अक्टूबर 2014 तक उसने बांड की खरीद शून्य कर दी। इसी दौरान हमारा रुपया डॉलर के मुकाबले ज़रूरत से ज्यादा कमज़ोर हो गया। कहीं, इसका दोहराव इसी नवंबर से न शुरू हो जाए? अब मंगल की दृष्टि…
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